शिकायत का मुख्य केंद्र वह आरोप था जिसमें कहा गया कि मेधा पाटकर ने एक टीवी शो के दौरान वीके सक्सेना की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचाने वाली टिप्पणी की थी। दावा किया गया था कि पाटकर ने सक्सेना और उनके एनजीओ पर सरदार सरोवर परियोजना से जुड़े सिविल कॉन्ट्रैक्ट हथियाने के गंभीर आरोप लगाए। हालांकि, न्याय की कसौटी पर मामला तब पलट गया जब अदालत ने पाया कि मेधा पाटकर उस चर्चा में बतौर पैनलिस्ट शामिल ही नहीं थीं। कोर्ट के आदेश के अनुसार, प्रसारण के दौरान केवल उनका एक संक्षिप्त प्री-रिकॉर्डेड वीडियो क्लिप चला था, जिससे यह सिद्ध नहीं होता कि उन्होंने उस मंच या लाइव कार्यक्रम में कोई आपत्तिजनक बयान दिया था।
करीब 25 साल पुराने इस कानूनी युद्ध की नींव तब पड़ी थी जब विनय कुमार सक्सेना ‘नेशनल काउंसिल फॉर सिविल लिबर्टीज’ नामक सामाजिक संगठन के प्रमुख थे। उस दौर में पाटकर द्वारा लगाए गए तीखे आरोपों के पलटवार में सक्सेना ने साल 2001 में मानहानि के दो अलग-अलग मुकदमे दायर किए थे। इनमें से एक मामला टेलीविजन साक्षात्कार में की गई विवादित टिप्पणियों पर आधारित था, जबकि दूसरा उनके द्वारा जारी प्रेस बयानों से संबंधित था।
Discover more from Aware Media News - Hindi News, Breaking News & Latest Updates
Subscribe to get the latest posts sent to your email.

