“वंदे मातरम” पर प्रियंका चतुर्वेदी का तीखा तंज: इतिहास, संस्कृति और राजनीतिक मंशा पर एक तीखी बहस
शिवसेना (यूबीटी) की मुखर सांसद, प्रियंका चतुर्वेदी, ने “वंदे मातरम” के इर्द-गिर्द चल रही राजनीतिक चर्चाओं पर एक तीखा प्रहार किया है। उन्होंने न केवल इस राष्ट्रीय उद्घोष के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को रेखांकित किया, बल्कि सत्ता पक्ष की मंशा पर भी सवाल उठाए।
चतुर्वेदी ने “वंदे मातरम” पर हो रही बहस का स्वागत करते हुए कहा, “मैं ‘वंदे मातरम’ पर चर्चा का स्वागत करती हूं। यह हमारे इतिहास का वो अटूट हिस्सा है, जो हमारी संस्कृति की जड़ों से गहराई से जुड़ा हुआ है। यह वो ऐतिहासिक दौर था जब हर भारतीय ने मिलकर इस देश को ब्रिटिश शासन से मुक्त कराने का संकल्प लिया था। इसलिए, आज की चर्चा देश के व्यापक हित में होनी चाहिए, न कि किसी राजनीतिक दल के संकीर्ण लाभ के लिए। यदि “वंदे मातरम” के विषय पर संसद में सही मायने में चर्चा हो, तो यह निश्चित रूप से एक सकारात्मक कदम होगा।”
हालांकि, उन्होंने सत्ता पक्ष पर निशाना साधते हुए कहा, “यह हास्यास्पद ही कहा जाएगा कि “वंदे मातरम” पर चर्चा वे लोग करना चाह रहे हैं, जिन्होंने खुद राज्यसभा में ‘एंटी-नेशन’ नोटिफिकेशन जारी किया था। वो वही लोग हैं जिन्होंने सांसदों पर “जय हिंद” और “वंदे मातरम” जैसे नारों पर पाबंदी लगाने का फरमान सुनाया था। यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि सत्ता पक्ष की ‘करनी और कथनी’ में कितना बड़ा अंतर है।”
प्रियंका चतुर्वेदी के इन शब्दों से “वंदे मातरम” पर चल रही राजनीतिक बहस में एक नई जान आ गई है, जो इस राष्ट्रीय प्रतीक के गहरे अर्थ और इसके उपयोग के पीछे की मंशा पर एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करती है।
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