लिपुलेख की रार: क्या भारत और नेपाल के ‘रोटी-बेटी’ के रिश्तों में घुलेगी कड़वाहट?
भारत और नेपाल के बीच सीमा विवाद की तपिश एक बार फिर बढ़ने लगी है। हाल ही में मानसरोवर यात्रा के लिए लिपुलेख दर्रे के इस्तेमाल पर नेपाल की बालेन सरकार द्वारा जारी ‘प्रोटेस्ट नोट’ ने कूटनीतिक हलकों में हलचल पैदा कर दी थी। भारत ने भी इस पर दो-टूक जवाब दिया, लेकिन अब इस आग में घी डालने का काम नेपाल के विपक्षी दलों ने किया है। नेपाली कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्ष ने प्रधानमंत्री बालेन शाह की सरकार पर सीधा दबाव बनाया है कि भारत और चीन के साथ महज ‘डिप्लोमेटिक नोट्स’ या कूटनीतिक चिट्ठियों का आदान-प्रदान बंद कर, लिपुलेख के मुद्दे पर सीधे ‘टेबल टॉक’ यानी उच्च स्तरीय वार्ता की जाए।
इस विवाद की ताज़ा वजह कैलाश मानसरोवर यात्रा को लेकर नेपाल का कड़ा विरोध है। दरअसल, भारत और चीन ने जैसे ही लिपुलेख दर्रे के रास्ते इस पावन यात्रा को फिर से शुरू करने की घोषणा की, नेपाल सरकार ने इसे अपनी संप्रभुता का मुद्दा बना लिया। नेपाल ने दोनों देशों को राजनयिक नोट भेजकर दावा किया कि उसकी सहमति के बिना इस मार्ग का उपयोग नहीं किया जा सकता।
इसी मुद्दे पर नेपाल की संसद की अंतरराष्ट्रीय संबंध समिति में विपक्षी सांसदों ने सरकार को जमकर आड़े हाथों लिया। नेपाली कांग्रेस के सांसद संदीप राणा ने दो-टूक कहा कि लिपुलेख, लिंपियाधूरा और कालापानी नेपाल की धरती है और भारत इसका एकतरफा इस्तेमाल कर रहा है। वहीं, केपी शर्मा ओली की पार्टी (CPN-UML) की सांसद भूमिका लिंबू सुबा ने भारत की प्रतिक्रिया को ‘गैर-जिम्मेदाराना’ करार दिया। विपक्ष की मांग स्पष्ट है—नेपाल सरकार को अब और कड़ा रुख अपनाना चाहिए और इन इलाकों पर अपना अधिकार जताने के लिए सीधी बातचीत करनी चाहिए।
दूसरी ओर, भारत का रुख इस मामले में हमेशा से ‘क्रिस्टल क्लियर’ यानी पूरी तरह स्पष्ट रहा है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने साफ कर दिया है कि लिपुलेख के रास्ते कैलाश मानसरोवर यात्रा कोई नई बात नहीं है, यह दशकों से चली आ रही परंपरा है। भारत ने नेपाल द्वारा जारी किए गए नए नक्शों और क्षेत्रीय दावों को ‘कृत्रिम’ और ‘एकतरफा’ करार दिया है। भारत ने संदेश दिया है कि वह बातचीत के लिए हमेशा तैयार है, लेकिन किसी भी तरह के अनुचित दबाव या ऐतिहासिक तथ्यों के साथ छेड़छाड़ को कतई स्वीकार नहीं किया जाएगा।
सामरिक दृष्टि से लिपुलेख, लिंपियाधुरा और कालापानी का क्षेत्र भारत, नेपाल और चीन के ‘ट्राई-जंक्शन’ पर स्थित है, जो भारत की सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। नेपाल में सत्ता परिवर्तन के साथ ही अक्सर इस मुद्दे को हवा दी जाती है, लेकिन इस बार विपक्ष का बढ़ता दबाव दोनों देशों के मधुर संबंधों में नई कड़वाहट पैदा कर सकता है। एक तरफ जहां भारत और नेपाल के बीच ‘रोटी-बेटी’ का अटूट और प्राचीन रिश्ता है, वहीं दूसरी तरफ ये सीमा विवाद और राजनेताओं के तीखे बयान इस ऐतिहासिक दोस्ती की परीक्षा ले रहे हैं।
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