तीस्ता के जरिए बांग्लादेश का बड़ा कूटनीतिक दांव: चीन से मांगा सहयोग, क्या बढ़ेगी भारत की चिंता?
तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बांग्लादेश की नई सरकार ने एक महत्वपूर्ण रणनीतिक कदम उठाते हुए तीस्ता नदी पुनर्स्थापन परियोजना के लिए चीन का औपचारिक समर्थन मांगा है। यह घटनाक्रम न केवल क्षेत्र की जल-राजनीति को गरमा सकता है, बल्कि भारत और बांग्लादेश के द्विपक्षीय संबंधों पर भी गहरे असर डाल सकता है।
बांग्लादेश की आधिकारिक समाचार एजेंसी ‘बांग्लादेश संगबाद संस्था’ (BSS) के अनुसार, बीजिंग में बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान और चीन के विदेश मंत्री वांग यी के बीच हुई द्विपक्षीय बैठक में ‘तीस्ता नदी व्यापक प्रबंधन एवं पुनर्स्थापन परियोजना’ (TRCMRP) पर विस्तार से चर्चा हुई। पूर्वी हिमालय से निकलकर सिक्किम और पश्चिम बंगाल के रास्ते बांग्लादेश में प्रवेश करने वाली तीस्ता नदी वहां के लाखों लोगों की आजीविका और सिंचाई का मुख्य आधार है।
बैठक के दौरान चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने ढाका की नई सरकार को आश्वस्त किया कि बीजिंग अपनी महत्वाकांक्षी ‘बेल्ट एंड रोड’ (BRI) परियोजना को बांग्लादेश की राष्ट्रीय विकास रणनीतियों के साथ जोड़ने के लिए पूरी तरह तैयार है। उन्होंने अर्थव्यवस्था, बुनियादी ढांचे और जन-संपर्क जैसे पारंपरिक क्षेत्रों में सहयोग को और अधिक प्रगाढ़ बनाने की प्रतिबद्धता जताई। साथ ही, उन्होंने चीनी कंपनियों को बांग्लादेश में निवेश के लिए प्रोत्साहित करने का भी वादा किया। चीन ने स्पष्ट किया कि दक्षिण एशियाई देशों के साथ उसके संबंधों का विकास किसी ‘तीसरे पक्ष’ को लक्षित नहीं करता और न ही उससे प्रभावित होना चाहिए।
फरवरी में सत्ता संभालने के बाद तारिक रहमान की यह पहली चीन यात्रा है। दिलचस्प बात यह है कि रहमान पिछले महीने ही भारत के दौरे पर थे। शेख हसीना के सत्ता से हटने और मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम प्रशासन आने के बाद ढाका के चीन और पाकिस्तान के करीब जाने की अटकलों के बीच, भारतीय नेतृत्व के साथ उनकी बातचीत पर बीजिंग की पैनी नजर थी।
चीन पिछले कई वर्षों से तीस्ता परियोजना (TRCMRP) में गहरी रुचि दिखा रहा है। यह परियोजना रणनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील भारत के ‘सिलीगुड़ी गलियारे’ (चिकन नेक) के करीब स्थित है, जो भारत की मुख्य भूमि को उसके पूर्वोत्तर राज्यों से जोड़ता है। इसी संवेदनशीलता को देखते हुए, भारत ने भी साल 2024 में तीस्ता बेसिन के लिए तकनीकी और संरक्षण सहायता की पेशकश की थी, ताकि सीमा-पार नदी प्रबंधन में ढाका के साथ सहयोग बढ़ाया जा सके।
मौजूदा समय में जल बंटवारा दोनों देशों के बीच एक संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है। विशेष रूप से 1996 में हस्ताक्षरित 30-वर्षीय ‘भारत-बांग्लादेश गंगा जल संधि’ इस वर्ष समाप्त होने वाली है, जिसे अगर समय रहते नवीनीकृत नहीं किया गया, तो तनाव बढ़ सकता है। ऐसे नाजुक वक्त में बांग्लादेश में चीन की बढ़ती आर्थिक और कूटनीतिक सक्रियता क्षेत्रीय राजनीति में एक नया अध्याय लिख रही है।
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