भारत-बांग्लादेश संबंध: तल्खी से गर्मजोशी तक, ‘ईद डिप्लोमेसी’ ने बदली रिश्तों की इबारत
एक दौर था जब भारत और बांग्लादेश की दोस्ती दुनिया के लिए एक मिसाल मानी जाती थी। विशेषकर शेख हसीना के कार्यकाल में दोनों देशों के बीच भरोसे का एक ‘स्वर्ण युग’ था। आतंकवाद के विरुद्ध साझा प्रहार, पेचीदा सीमा विवादों का समाधान और गहरा आर्थिक सहयोग—इन सबने मिलकर एक अटूट साझेदारी की नींव रखी थी। लेकिन अगस्त 2024 के छात्र आंदोलन ने अचानक हवाओं का रुख बदल दिया। तख्तापलट हुआ, शेख हसीना को सत्ता छोड़नी पड़ी और एक अंतरिम व्यवस्था की शुरुआत हुई। इसके साथ ही रिश्तों की गर्माहट, ठंडेपन और अविश्वास में बदलने लगी। भारत विरोधी सुर मुखर हुए और हिंदू समुदाय पर हमलों की खबरों ने दूरियां और बढ़ा दीं।
हालाँकि, वक्त का पहिया फिर घूमा। बांग्लादेश में चुनावों के बाद बीएनपी (BNP) सत्ता के गलियारों में लौटी और तारिक रहमान के रूप में एक नया नेतृत्व उभरकर सामने आया। तारिक रहमान के प्रधानमंत्री बनते ही कूटनीतिक गलियारों में नरमी के संकेत मिलने लगे। इसी बीच एक ऐसी खबर आई जिसने सबको चौंका दिया—बांग्लादेश के प्रधानमंत्री ने भारतीय प्रधानमंत्री को एक ‘विशेष पत्र’ लिखा। यह महज़ एक औपचारिक संदेश नहीं था, बल्कि इसमें रिश्तों को फिर से पटरी पर लाने का एक बड़ा विज़न छिपा था। इस पत्र में ऐतिहासिक संबंधों और सांस्कृतिक जुड़ाव का हवाला देते हुए साझेदारी को नई ऊंचाइयों पर ले जाने का संकल्प जताया गया।
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राजनीतिक विश्लेषक इस पूरे घटनाक्रम को ‘ईद डिप्लोमेसी’ का नाम दे रहे हैं। ईद के पावन अवसर पर दोनों देशों के शीर्ष नेताओं ने न केवल शुभकामनाओं का आदान-प्रदान किया, बल्कि भाईचारे और दया के संदेश को कूटनीति का आधार बनाया। बांग्लादेशी प्रधानमंत्री ने अपने पत्र में लिखा कि ईद हमें जिस एकता की याद दिलाती है, वही भाव दोनों देशों के संबंधों में भी झलकना चाहिए।
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भारत की ओर से भी इस पहल का सकारात्मक जवाब मिला। त्योहार के बहाने रिश्तों की कड़वाहट को मिठास में बदलने की यह कोशिश रंग लाई। पत्र के बाद दोनों प्रधानमंत्रियों के बीच टेलीफोन पर सार्थक बातचीत हुई और उच्च स्तरीय संवाद का सिलसिला शुरू हुआ। रिश्तों में सुधार का सबसे बड़ा प्रमाण तब दिखा, जब बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह में भारत की ओर से लोकसभा अध्यक्ष की गरिमामयी उपस्थिति रही।
तारिक रहमान के इस पत्र में तीन बड़े कूटनीतिक संदेश निहित थे। पहला—’इतिहास और भरोसा’, यानी पुरानी नींव पर फिर से नई इमारत खड़ी करना। दूसरा—’जनता का हित’, जिसके तहत आर्थिक और सामाजिक सहयोग से आम लोगों के जीवन को बेहतर बनाना। और तीसरा—’भविष्य की साझेदारी’, जो क्षेत्रीय शांति, स्थिरता और विकास के साझा लक्ष्यों पर टिकी हो। आज भारत और बांग्लादेश एक बार फिर उसी भरोसे की तलाश में हैं, जो कभी उनकी पहचान हुआ करती थी।
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