भारत-अरब कूटनीति का नया अध्याय: 10 साल बाद सजेगी विदेश मंत्रियों की विशेष बैठक
भारतीय विदेश नीति के मंच पर 31 जनवरी का दिन बेहद अहम होने वाला है, जब भारत-अरब विदेश मंत्रियों की दूसरी ऐतिहासिक बैठक आयोजित की जाएगी। इस भव्य आयोजन के लिए अरब जगत के दिग्गजों का आगमन शुरू हो चुका है। सूडान गणराज्य के विदेश मंत्री मोहिएलदीन सलीम अहमद इब्राहिम, फलस्तीन की विदेश मंत्री वर्सेन अघाबेकियन और कोमोरोस के विदेश मंत्री मोहम्मद चानफिउ राजधानी पहुंच चुके हैं। इस बार कूटनीति की इस बिसात पर भारत और यूएई संयुक्त रूप से अध्यक्षता की कमान संभालेंगे। अरब लीग के अन्य सदस्य देशों के विदेश मंत्री और महासचिव भी इस चर्चा का हिस्सा बनेंगे। गौरतलब है कि यह महत्वपूर्ण बैठक पूरे एक दशक के इंतजार के बाद हो रही है; इससे पहले यह सिलसिला 2016 में बहरीन में थमा था। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने सोशल मीडिया के जरिए इन वैश्विक नेताओं का गर्मजोशी से स्वागत करते हुए विश्वास जताया कि यह यात्रा भारत-अरब संबंधों को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगी।
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लीग ऑफ अरब स्टेट्स (LAS) की संरचना को देखें तो इसमें परिषद, विशेष मंत्रिस्तरीय समितियां, महासचिव सचिवालय और विशिष्ट एजेंसियां अपनी भूमिका निभाती हैं। सदस्य देशों के विदेश मंत्रियों से सुसज्जित ‘परिषद’ इसका प्रमुख राजनीतिक स्तंभ है, जिसकी बैठकें साल में दो बार आयोजित की जाती हैं। यहाँ लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत प्रत्येक देश को एक मत का अधिकार है, हालांकि इसके निर्णय केवल उन्हीं देशों पर लागू होते हैं जो इसके पक्ष में होते हैं। बहुमत के आधार पर फैसले लेने वाली इस लीग की अक्सर आलोचना भी होती रही है, क्योंकि इसके पास निर्णयों को अनिवार्य रूप से लागू करने का कोई ठोस तंत्र नहीं है, जिससे आंतरिक संघर्षों और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर कभी-कभी सामूहिक निष्क्रियता की स्थिति बनी रहती है। इसके बावजूद, LAS का वैश्विक रसूख कम नहीं है; यह अफ्रीकी संघ, यूरोपीय संघ, आसियान और दक्षिण अमेरिकी राष्ट्र संघ जैसे बड़े संगठनों के साथ निरंतर संवाद बनाए रखती है।
वैश्विक कूटनीति के पटल पर चीन और LAS ने साल 2008 में ही एक संस्थागत संवाद तंत्र की नींव रख दी थी, जिसमें व्यापार, ऊर्जा और रणनीतिक सहयोग जैसे क्षेत्र शामिल हैं। इसके साथ ही अरब लीग के संबंध रूस, ब्राजील और फ्रांस जैसे शक्तिशाली देशों से भी बेहद प्रगाढ़ हैं। वर्तमान में अहमद अबुल घीत इसके महासचिव की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। लीग का नेटवर्क इतना विशाल है कि अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और जर्मनी सहित दुनिया के 20 से अधिक देशों में इसके मिशन कार्यरत हैं, और विशेष बात यह है कि भारत में भी इसका एक सक्रिय मिशन मौजूद है।
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भारत और अरब जगत का नाता कोई नया नहीं है, बल्कि व्यापार, कूटनीति और विद्वता के जरिए यह प्राचीन काल से ही अटूट रहा है। आधुनिक दौर में इस रिश्ते को कानूनी ढांचा देने के लिए मार्च 2002 में एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए। इसके बाद ‘अरब-भारत सहयोग मंच’ की नींव दिसंबर 2008 में रखी गई, जिसे समय की मांग के अनुसार दिसंबर 2013 में और अधिक प्रभावी बनाने के लिए संशोधित किया गया। अब 31 जनवरी की यह बैठक इसी पुरानी दोस्ती को आधुनिक वैश्विक चुनौतियों के बीच एक नया विस्तार देने का काम करेगी।
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