अमेरिका ने अपना पहला मुस्लिम सीनेटर चुनकर एक नया इतिहास रच दिया है। 3 नवंबर के मध्यावधि चुनावों में डेमोक्रेट अब्दुल अल-सैयद ने मिशिगन सीनेट सीट पर शानदार जीत दर्ज की है। इन चुनावों में पूरे देश में डेमोक्रेटिक पार्टी की ‘ब्लू वेव’ देखने को मिली। हालांकि, बेहद कम लोग इस बात से वाकिफ होंगे कि उनकी जीत का सीधा कनेक्शन कर्नाटक से भी जुड़ा है। दरअसल, उनकी पत्नी डॉ. सारा जुकाकू, पूर्व मैसूर राज्य सरकार के एक कद्दावर मंत्री की पोती हैं।
सारा का परिवार कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ जिले के भटकल से ताल्लुक रखता है, जो मंगलुरु से लगभग 140 किलोमीटर उत्तर में बसा एक खूबसूरत तटीय शहर है। उनके दादा जे.एच. शम्सुद्दीन जुकाकू अपने दौर के एक जाने-माने वकील, प्रतिष्ठित शिक्षाविद और कद्दावर राजनेता थे। उन्होंने 1950 के दशक में तत्कालीन मैसूर राज्य सरकार में उप-वित्त मंत्री के तौर पर अपनी सेवाएं दी थीं।
जानकारी के लिए बता दें कि मैसूर राज्य का गठन तब हुआ था जब 1950 में मैसूर साम्राज्य को भारतीय गणराज्य में शामिल किया गया था। इसके बाद 1 नवंबर 1956 को ‘राज्य पुनर्गठन अधिनियम’ के तहत इसका विस्तार किया गया और नवंबर 1973 में इसका आधिकारिक नाम बदलकर कर्नाटक कर दिया गया।
जे.एच. शम्सुद्दीन जुकाकू कौन थे?
जे.एच. शम्सुद्दीन जुकाकू भटकल की एक बेहद जानी-माने शख्सियत और वकील थे, जो प्रतिष्ठित ‘नवायात मुस्लिम समुदाय’ से ताल्लुक रखते थे। यह एक प्राचीन मुस्लिम व्यापारी समुदाय है, जो सदियों पहले अरब प्रायद्वीप, ईरान और इrak से आकर दक्षिण भारत के तटीय शहरों में बस गया था। ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, शम्सुद्दीन अपने समुदाय के पहले ऐसे शख्स थे जिन्होंने वकालत की डिग्री हासिल की और बाद में मंत्री पद तक पहुंचे। साल 1946 में वे बॉम्बे लेजिस्लेटिव असेंबली के लिए चुने गए थे। इसके बाद उन्होंने मैसूर लेजिस्लेटिव असेंबली में होन्नावर निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया और 1957 तथा 1962 के चुनाव में शानदार जीत हासिल की। साल 1958 में वे मुख्यमंत्री बी.डी. जत्ती के नेतृत्व वाली सरकार में वित्त उप-मंत्री बने। इतना ही नहीं, उन्होंने मुख्यमंत्री एस. निजलिंगप्पा के कार्यकाल में बिजली उप-मंत्री के रूप में भी अहम जिम्मेदारी संभाली थी।
10 अक्टूबर को ‘अमेरिकन बाज़ार’ में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार, शम्सुद्दीन के गृहनगर भटकल के लोगों का आज भी यह मानना है कि उस पूरे इलाके में बिजली और अन्य बुनियादी सुविधाओं को पहुंचाने में उनका बहुत बड़ा योगदान था। वे ‘अंजुमन हामी-ए-मुस्लिमीन’ नाम के एक चैरिटेबल ट्रस्ट से भी गहराई से जुड़े हुए थे, जो आज भी इस शहर में कई शिक्षण संस्थान चलाता है। भटकल के ही रहने वाले इंजीनियर मोहम्मद तनवीर कसरकोड़, जो इस परिवार के इतिहास की गहरी समझ रखते हैं, ने ‘अमेरिकन बाज़ार’ को बताया कि शम्सुद्दीन उस दौर में वकील बने थे जब आम लोगों के लिए शिक्षा तक पहुंच बेहद सीमित हुआ करती थी। यही वजह है कि दशकों तक भटकल का एक प्रमुख चौराहा उन्हीं के सम्मान में ‘शम्सुद्दीन सर्कल’ के नाम से जाना जाता था। हालांकि, बाद में सड़क चौड़ीकरण के विकास कार्यों के दौरान इस चौराहे की संरचना को हटा दिया गया, लेकिन आज भी यह नाम पूर्व मंत्री की यादों के साथ मजबूती से जुड़ा हुआ है। महज 52 वर्ष की अल्पायु में शम्सुद्दीन का निधन हो गया था। उनके परिवार में छह बेटियां और चार बेटे थे, और समय के साथ उनका परिवार भारत के अलग-अलग हिस्सों में फैल गया, जिनमें से कई सदस्य आगे चलकर बेंगलुरु में बस गए।
भटकल से अमेरिका तक
शम्सुद्दीन के होनहार बेटों में से एक, डॉ. जुकाकू एस. तैयब उन चुनिंदा लोगों में शामिल थे जिन्होंने बेहतर भविष्य और अवसरों की तलाश में भटकल से बाहर कदम रखा। पेशे से नेफ्रोलॉजिस्ट (गुर्दा रोग विशेषज्ञ) डॉ. तैयब ने साल 1976 में प्रतिष्ठित बैंगलोर मेडिकल कॉलेज से अपनी मेडिकल की पढ़ाई पूरी की थी। ‘द अमेरिकन बाज़ार’ की रिपोर्ट के मुताबिक, 1980 के दशक में अमेरिका शिफ्ट होने से पहले उन्होंने कुछ समय सऊदी अरब में भी अपनी सेवाएं दी थीं। उन्होंने 1984 से 1987 के बीच मिशिगन के बॉन सेकर्स अस्पताल से इंटरनल मेडिसिन में अपनी रेजीडेंसी पूरी की और फिर 1987 से 1989 तक हेनरी फोर्ड अस्पताल से नेफरोलॉजी में फेलोशिप हासिल की। इसके बाद उन्होंने डेट्रॉइट इलाके में अपनी सफल मेडिकल प्रैक्टिस की शुरुआत की। उनकी बेटी सारा का जन्म और लालन-पालन मिशिगन के ही एक भारतीय प्रवासी परिवार में हुआ। हालांकि सारा का पूरा जीवन अमेरिका में ही बीता, लेकिन उनके पिता ने यह सुनिश्चित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि उनके बच्चे अपनी भारतीय संस्कृति और जड़ों से हमेशा जुड़े रहें। इसके लिए वे अक्सर उन्हें बेंगलुरु और भटकल की यात्राओं पर लेकर आते थे। ‘द अमेरिकन बाज़ार’ के अनुसार, इस परिवार का कूर्ग से भी गहरा नाता रहा है, जबकि परिवार के कई अन्य सदस्य आज भी बेंगलुरु में ही निवास करते हैं।
सारा जुकाकू और अब्दुल अल-सैयद की मुलाकात कैसे हुई?
सारा ने अमेरिका की मशहूर यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन से अपनी उच्च शिक्षा हासिल की, और वहीं उनकी मुलाकात अब्दुल अल-सैयद से हुई। दोनों ही यूनिवर्सिटी के ‘मुस्लिम स्टूडेंट्स एसोसिएशन’ से सक्रिय रूप से जुड़े हुए थे और आपसी नजदीकियों के बाद मई 2006 में दोनों ने हमेशा के लिए एक-दूजे का हाथ थाम लिया। ‘द अमेरिकन बाज़ार’ के मुताबिक, जब सारा और अल-सैयद की शादी हुई थी, तब सारा की उम्र महज 19 साल और अल-सैयद की उम्र 21 साल थी। इसके बाद सारा ने अपनी आगे की पढ़ाई के लिए ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी का रुख किया और साल 2015 में कोलंबिया यूनिवर्सिटी के प्रतिष्ठित ‘वैगेलोस कॉलेज ऑफ फिजिशियंस एंड सर्जन्स’ से मेडिकल की डिग्री प्राप्त की। इस रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने आगे चलकर मनोरोग विज्ञान (साइकियाट्री) के क्षेत्र में अपना शानदार करियर बनाया और ‘यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन हेल्थ’ में साइकियाट्री डिपार्टमेंट में एक नेतृत्वकारी भूमिका भी निभाई। दिलचस्प बात यह है कि खुद अब्दुल अल-सैयद ने भी सार्वजनिक मंचों पर अपनी पत्नी की समृद्ध भारतीय विरासत और उसके साथ अपने गहरे जुड़ाव का खुलकर जिक्र किया है।
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