गाजा शांति की ओर: ट्रंप की 20 सूत्रीय योजना और पश्चिम एशिया का नया अध्याय
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा गाजा में शांति स्थापित करने के उद्देश्य से पेश की गई 20 सूत्रीय योजना क्षेत्र में नई उम्मीद जगा रही है। इस योजना के तहत, जहाँ इस्राइल से गाजा में सैन्य अभियानों को तत्काल रोकने की अपेक्षा की गई है, वहीं हमास को इस्राइली बंधकों को रिहा करने का निर्देश दिया गया है। हालांकि, इस योजना में भविष्य में गाजा के शासन में हमास की भूमिका को पूर्णतः समाप्त करने का प्रावधान है। उल्लेखनीय है कि हमास ने, कुछ झिझक और संदेह के बावजूद, इस योजना पर अपनी सहमति जता दी है। यह ट्रंप की ओर से एक अंतिम अवसर के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें उन्होंने स्पष्ट किया था कि यदि 72 घंटों के भीतर, यानी रविवार शाम 6 बजे तक, हमास सहमत नहीं होता है, तो अमेरिका पूरी तरह से इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ खड़ा होगा।
ट्रंप की इस पहल की प्रशंसा स्वाभाविक है। दो वर्ष से अधिक समय से जारी संघर्ष में गाजा में हताहतों की संख्या लगभग 70,000 फिलिस्तीनी नागरिकों तक पहुँच चुकी है। इस्राइल द्वारा नियंत्रित वेस्ट बैंक का प्रशासन संभाल रहे फिलिस्तीनी अधिकारियों ने ट्रंप की योजना को “गंभीर और दृढ़ निश्चय” वाली बताया है। यूरोपीय देशों के साथ-साथ भारत ने भी इस योजना का खुले दिल से स्वागत किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस योजना को फिलिस्तीनी और इस्राइली लोगों के साथ-साथ पूरे पश्चिम एशियाई क्षेत्र के लिए “लंबे समय तक चलने वाली स्थायी शांति, सुरक्षा और विकास का एक कारगर रास्ता” करार दिया है। यह ध्यान देने योग्य है कि भारत ने हाल ही में संयुक्त राष्ट्र महासभा में उस प्रस्ताव का समर्थन किया था जो फिलिस्तीन मुद्दे के शांतिपूर्ण समाधान, अर्थात द्विराष्ट्र समाधान का पक्षधर है। इससे पहले भी भारत ने गाजा की नाजुक स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की थी।
इन सकारात्मक संकेतों के बावजूद, वर्तमान घटनाक्रम को पश्चिम एशिया में एक “छोटी-सी शुरुआत” के रूप में ही देखना विवेकपूर्ण होगा। इसका एक प्रमुख कारण यह है कि इस्राइल और हमास, दोनों ही प्रमुख पक्ष, इस योजना के प्रति पूरी तरह समर्पित नहीं दिख रहे हैं। ट्रंप द्वारा इस्राइल से तत्काल हमला रोकने का आग्रह किए जाने के बावजूद, इस्राइली सैनिकों द्वारा हवाई हमला कर 60 से अधिक लोगों की हत्या, यह संकेत देती है कि फिलहाल अमेरिकी राष्ट्रपति का दबाव ही इस शांति योजना को आगे बढ़ा रहा है। इसके अतिरिक्त, वर्तमान में मुख्य ध्यान गाजा पर केंद्रित है, जबकि स्वतंत्र फिलिस्तीन का मूलभूत मुद्दा अभी भी पृष्ठभूमि में ही है।
इस मामले में संदेह का एक और महत्वपूर्ण कारण भविष्य के चरणों में फिलिस्तीन को अधिकार प्रदान करने की दिशा में अस्पष्टता है। जबकि “द्विराष्ट्र समाधान” ही इस संघर्ष का मूल मुद्दा है, ट्रंप की महत्वाकांक्षी योजना में इसका कोई स्पष्ट खाका नहीं दिखता। इसके बजाय, योजना में हमास के निरस्त्रीकरण और गाजा को “बोर्ड ऑफ पीस” के तहत संचालित करने की शर्त शामिल है, जिसका नेतृत्व स्वयं अमेरिकी राष्ट्रपति करेंगे। योजना के अनुसार, इस्राइल चरणबद्ध तरीके से गाजा से हटेगा, बंधकों की अदला-बदली होगी, और अरब देश पुनर्निर्माण का खर्च वहन करेंगे, जिसके बदले में फिलिस्तीन को भविष्य में एक राज्य का अस्पष्ट वादा किया गया है।
इस परिप्रेक्ष्य में, पाकिस्तान और कई अरब राष्ट्रों पर फिलिस्तीन के मुद्दे से “धोखा” करने के आरोप लग रहे हैं, और इसे “टू स्टेट सॉल्यूशन” के बजाय “टू स्टेट सरेंडर” के रूप में भी देखा जा रहा है। जाहिर है, इस स्थिति के पीछे इस्राइल की आक्रामकता के साथ-साथ अमेरिका का रवैया भी जिम्मेदार है। अमेरिका ने जहाँ फिलिस्तीनी अधिकारियों को संयुक्त राष्ट्र महासभा में भाग लेने से रोका, वहीं नेतन्याहू ने स्वतंत्र फिलिस्तीन की स्थापना की स्थिति में “एकतरफा कार्रवाई” की धमकी दी है। सीधी बात यह है कि फिलिस्तीनियों को विश्वास में लिए बिना या उन्हें उचित अधिकार दिए बिना, पश्चिम एशिया में कोई भी पहल अधूरी ही रहेगी। बहुत अधिक उम्मीदें इसलिए भी नहीं हैं, क्योंकि इससे पहले भी इस मुद्दे के समाधान के प्रयास गंभीरता और सर्वसम्मति के अभाव में विफल हो चुके हैं।
तो सवाल उठता है कि जो ट्रंप हाल-फिलहाल तक गाजा मुद्दे पर नेतन्याहू के साथ खड़े थे, उन्हें अचानक यह पहल क्यों करनी पड़ी? दो तात्कालिक कारणों ने पश्चिम एशिया मुद्दे के हल के लिए ट्रंप पर दबाव बनाया होगा। पहला, इस्राइल की आक्रामकता को देखते हुए पश्चिमी देशों द्वारा फिलिस्तीन को मान्यता देना शुरू कर देना। इससे ट्रंप को लगा होगा कि उन्हें समाधान की दिशा में सक्रियता दिखानी चाहिए। पिछले महीने, ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया ने औपचारिक रूप से फिलिस्तीन को एक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता दी थी। यह एक बड़ा कदम था, क्योंकि पहली बार जी-7 की उन्नत अर्थव्यवस्था वाले देशों ने फिलिस्तीन को यह मान्यता दी। इसके बाद पुर्तगाल ने भी फिलिस्तीन को मान्यता दी। नेतन्याहू ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में इस मुद्दे पर पश्चिमी देशों के प्रति अपनी नाराजगी व्यक्त की थी, क्योंकि वह फिलिस्तीन को मिलने वाली अंतरराष्ट्रीय मान्यता को “इस्राइल पर हमले” के रूप में चित्रित करते हैं।
ट्रंप के अचानक सक्रिय होने का दूसरा बड़ा कारण इस्राइल द्वारा हाल ही में कतर में हमास के सदस्यों पर किया गया हमला था। इस घटनाक्रम ने ट्रंप को नाराज़ किया, क्योंकि कतर अमेरिका का एक महत्वपूर्ण सहयोगी है। ऐसे में, ट्रंप को यह महसूस हुआ कि पश्चिम एशिया के मामले में अमेरिकी उदासीनता गंभीर परिणाम दे सकती है। सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुआ समझौता भी ट्रंप के लिए एक चेतावनी के समान है, जो यह दर्शाता है कि यदि इस्राइल की मनमानी इसी तरह जारी रही, तो मुस्लिम देशों की एकजुटता एक अलग किस्म की चुनौती खड़ी कर सकती है। इसीलिए ट्रंप पश्चिम एशिया की समस्या के हल के लिए आनन-फानन में 20 सूत्रीय योजना लेकर आए, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि ट्रंप का मुख्य जोर फिलहाल इस्राइली बंधकों की रिहाई पर ही है।
हालांकि, ट्रंप को इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिए कि उन्होंने फिलिस्तीन-इस्राइल विवाद को सुलझाने की दिशा में कई बार प्रयास किए हैं। ट्रंप ने यह भी स्पष्ट किया है कि वे वेस्ट बैंक को इस्राइल द्वारा हथियाने नहीं देंगे, जबकि नेतन्याहू और उनके धुर दक्षिणपंथी गठबंधन सहयोगी लंबे समय से वेस्ट बैंक के बड़े हिस्से पर कब्जा करना चाहते हैं, जिससे स्वतंत्र फिलिस्तीन की स्थापना असंभव हो जाएगी। यदि इस्राइली सैनिकों द्वारा गोलीबारी बंद करने पर सहमति बनी है, तो उसके पीछे ट्रंप की सक्रियता ही है। लेकिन उनकी इस अत्यंत महत्वाकांक्षी योजना के आगे के चरणों के बारे में जब तक स्पष्टता नहीं आती, तब तक पूरी तरह आश्वस्त नहीं हुआ जा सकता।
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