वाशिंगटन के गलियारों में इस वक्त एक ऐसी सैन्य योजना की सुगबुगाहट है, जो वैश्विक राजनीति के समीकरण बदल सकती है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अब इस गंभीर विकल्प पर विचार कर रहे हैं कि क्या ईरान के परमाणु ठिकानों से लगभग 1,000 पाउंड (453.5 किलोग्राम) समृद्ध यूरेनियम को सीधे जब्त करने के लिए अमेरिकी सेना को मैदान में उतारा जाए। वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक, यदि इस साहसी मिशन को हरी झंडी मिलती है, तो अमेरिकी कमांडो कई दिनों तक ईरानी सरजमीं पर तैनात रह सकते हैं, जो मौजूदा संघर्ष को एक अभूतपूर्व स्तर पर ले जाएगा। हालांकि, ट्रंप ने अभी अंतिम मुहर नहीं लगाई है, लेकिन ईरान को ‘परमाणु मुक्त’ रखने की अपनी जिद के कारण वे इस विकल्प के प्रति काफी गंभीर हैं।
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ट्रंप ने जहां एक ओर कूटनीति का दरवाजा खुला रखा है, वहीं दूसरी ओर अपने सलाहकारों को ईरान पर चौतरफा दबाव बनाने का निर्देश दिया है। उनका स्पष्ट मानना है कि “ईरान परमाणु सामग्री को अपने पास नहीं रख सकता।” निजी चर्चाओं में उन्होंने संकेत दिया है कि अगर बातचीत से बात नहीं बनी, तो बल प्रयोग ही अंतिम रास्ता होगा। पत्रकारों को चेतावनी देते हुए ट्रंप ने बेहद सख्त लहजे में कहा कि ईरान को अमेरिकी शर्तों को मानना ही होगा, अन्यथा “उनका कोई देश नहीं बचेगा।” यूरेनियम के खतरे पर उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि वे हमें सिर्फ परमाणु धूल ही देंगे।
परदे के पीछे कोशिशें, पर सीधा संवाद शून्य
हैरानी की बात यह है कि पाकिस्तान, तुर्की और मिस्र जैसे देश मध्यस्थ की भूमिका निभाते हुए परदे के पीछे से सेतु बनाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन वाशिंगटन और तेहरान के बीच अब तक कोई सीधी मेज नहीं सजी है। व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लीविट ने इस पूरी तैयारी को एक सामान्य रणनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा बताया। उन्होंने स्पष्ट किया कि कमांडर-इन-चीफ को अधिकतम विकल्प उपलब्ध कराना पेंटागन की जिम्मेदारी है, और इसका मतलब यह कतई नहीं कि कोई निश्चित फैसला ले लिया गया है। फिलहाल, पेंटागन और अमेरिकी केंद्रीय कमान ने ऑपरेशन की बारीकियों पर चुप्पी साध रखी है।
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कहां छिपा है ‘परमाणु खतरा’?
विशेषज्ञों और राफेल ग्रॉसी के आंकड़ों के अनुसार, पिछले हमलों के बावजूद ईरान के पास 60 प्रतिशत शुद्धता वाला 400 किलो और 20 प्रतिशत शुद्धता वाला लगभग 200 किलो यूरेनियम होने का अनुमान है। माना जा रहा है कि यह खतरनाक जखीरा इस्फ़हान की रहस्यमयी भूमिगत सुरंगों और नतान्ज़ के परमाणु केंद्रों में सुरक्षित रखा गया है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान के पास इतनी क्षमता है कि वह जरूरत पड़ने पर रातों-रात नए भूमिगत संवर्धन केंद्र तैयार कर सकता है, जो अमेरिकी सेना के लिए इस मिशन को और भी चुनौतीपूर्ण बना सकता है।
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