ईरान की घेराबंदी: अपनों की बेरुखी और रणनीतिक चक्रव्यूह में फंसा पाकिस्तान
मध्यस्थता का ख्वाब देखने वाला पाकिस्तान आज खुद कूटनीति के खतरनाक दलदल में धंस चुका है। खाड़ी में छिड़ी इस भीषण जंग ने इस्लामाबाद के लिए ‘तटस्थ’ बने रहने के तमाम रास्ते बंद कर दिए हैं। कल तक जो शहबाज-मुनीर की जोड़ी अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत की मेज सजाने की जुगत में थी, आज वही जोड़ी एक बेहद जटिल रणनीतिक जाल में उलझ गई है। इसकी सीधी वजह यमन के हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब पर दोबारा किए गए मिसाइल हमले हैं। पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच एक सीधा रक्षा समझौता है, जो यह तय करता है कि यदि सऊदी पर कोई बाहरी आंच आई, तो पाकिस्तानी फौज को उसके बचाव में मैदान में उतरना ही होगा। यही कारण है कि पाकिस्तानी विदेश मंत्री इशाक डार ने संसद में बेहद सख्त लहजे में ईरान को चेतावनी दी कि वह पाकिस्तान-सऊदी के अटूट रक्षा समझौते की गंभीरता को न भूले।
आज पाकिस्तान ‘मध्यस्थ’ और ‘रणनीतिक साझेदार’ की दोहरी भूमिकाओं के बीच बुरी तरह पिस रहा है। सऊदी का पक्ष लेते हुए पाकिस्तान ने अब हूती विद्रोहियों को भी कड़ा अल्टीमेटम दे दिया है कि वे सऊदी अरब पर हमले तुरंत रोकें, वरना अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहें। पाकिस्तान के बाद इस क्षेत्रीय उठापटक का सबसे बड़ा झटका कतर को लगा है। खाड़ी देशों में कतर की भूमिका हमेशा एक ‘बैलेंसर’ की रही है—एक तरफ उसके पास अमेरिका का सबसे बड़ा सैन्य अड्डा है, तो दूसरी तरफ ईरान के साथ उसके गहरे कूटनीतिक रिश्ते। जब भी अमेरिका-ईरान तनाव चरम पर पहुंचा, दोहा ही वह जगह थी जहां सुलह का रास्ता निकलता था। लेकिन हालिया संघर्ष में ईरान ने कतर पर ही मिसाइल और ड्रोन दाग दिए। हालांकि तेहरान ने सफाई दी कि उसका निशाना अमेरिकी ठिकाने थे, न कि कतर, लेकिन दोहा ने इसे अपनी संप्रभुता पर सीधा प्रहार मानते हुए साफ कर दिया कि ईरान ने सारी ‘रेड लाइन्स’ पार कर दी हैं। नतीजा यह कि कतर अब सुरक्षा के लिए अमेरिका के और करीब जाने को मजबूर हो गया है।
ईरान की मुश्किलें यहीं नहीं रुक रहीं। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में संयुक्त राष्ट्र के साथ मिलकर शिपिंग कॉरिडोर की सुरक्षा करने वाला ओमान भी अब ईरान के खिलाफ खड़ा नजर आ रहा है। ओमानी कॉरिडोर से गुजरने वाले व्यापारिक जहाजों पर ईरानी हमलों के बाद ओमान ने तेहरान को कड़ी चेतावनी जारी की है। रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान पूरे खाड़ी क्षेत्र को यह संदेश देना चाहता है कि यदि उसके खिलाफ कोई सैन्य कार्रवाई या ‘गद्दारी’ हुई, तो इसका असर सिर्फ अमेरिका और इजराइल तक सीमित नहीं रहेगा। वह होर्मुज स्टेट पर अपनी शर्तें थोपने की कोशिश कर रहा है, लेकिन उसकी यह आक्रामक रणनीति अब उसी के खिलाफ एक नया क्षेत्रीय गठबंधन तैयार कर रही है। जानकारों का मानना है कि इस वक्त ईरान की सबसे बड़ी चुनौती अमेरिकी मिसाइलें नहीं, बल्कि उसका बढ़ता हुआ अकेलापन है। उसके वे पुराने साझेदार भी अब उससे दूरी बना रहे हैं या पाला बदल रहे हैं, जो कल तक उसके लिए ढाल बनकर खड़े थे। कतर अब अमेरिकी पाले में जा चुका है, पाकिस्तान दोहरे दबाव में है और ओमान का रुख भी पूरी तरह बदल चुका है।
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