7 अगस्त की वो रात और ‘इस्लामिक नेटो’ का उदय: मिडिल ईस्ट में छिड़ा महासंग्राम
7 अगस्त की तारीख इतिहास के पन्नों में एक बड़े रणनीतिक भूचाल के रूप में दर्ज हो गई है। मक्का की पवित्र धरती पर सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने एक ऐसे ‘मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट’ पर मुहर लगाई, जिसने पूरी दुनिया के शक्ति संतुलन को हिला दिया है। जानकार इसे ‘इस्लामिक नेटो’ की आहट मान रहे हैं। लेकिन जैसे ही पाकिस्तान की परमाणु शक्ति और तुर्की की घातक ड्रोन टेक्नोलॉजी के एक साथ आने की खबर फैली, ईरान की दहाड़ ने वैश्विक गलियारों में सन्नाटा खींच दिया। ईरान ने दो टूक चेतावनी देते हुए कहा कि सऊदी अरब भ्रम में न रहे, क्योंकि ‘कागज के टुकड़े’ कभी जान नहीं बचाते।
क्या है इस समझौते की असली ताकत?
इस एग्रीमेंट का सबसे घातक हिस्सा है इसका ‘कलेक्टिव डिफेंस क्लॉज़’। यह ठीक वैसे ही काम करेगा जैसे नाटो का ‘आर्टिकल 5’ करता है—यानी किसी एक सदस्य पर हमला, सब पर हमला माना जाएगा। अब अगर यमन के हूती विद्रोही या ईरानी सेना सऊदी अरब की ओर आंख उठाकर देखती है, तो पाकिस्तान की विशाल फौज और तुर्की की आधुनिक वायुसेना को सीधे युद्ध के मैदान में उतरना होगा। यह पश्चिम एशिया के इतिहास में पिछले कई दशकों का सबसे बड़ा ‘जियोपॉलिटिकल शिफ्ट’ है।
तुर्की और पाकिस्तान ही क्यों?
सऊदी की इस रणनीति के पीछे तुर्की के ‘बैरख्तर ड्रोंस’ का जादू है। तुर्की आज दुनिया का उभरता हुआ डिफेंस हब है, जिसके पास नेटो की ट्रेनिंग और युद्धों का कड़वा अनुभव है। दूसरी तरफ पाकिस्तान है, जिसकी माली हालत भले ही खस्ता हो, लेकिन उसके पास एक विशाल सेना और परमाणु बमों का जखीरा है। ईरान के परमाणु खतरे से बचने के लिए सऊदी अरब को पाकिस्तान का ‘न्यूक्लियर अंब्रेला’ एक मानसिक सुरक्षा देता है। इस त्रिकोण में सऊदी का पैसा होगा, तुर्की की टेक्नोलॉजी और पाकिस्तान की मैन पावर।
ईरान का पलटवार: “सिर्फ दिखावा है यह पैक्ट”
ईरान ने इस गठबंधन को सिरे से खारिज कर दिया है। ईरानी सांसद इब्राहिम रजई ने इसे महज एक ‘पेपर एग्रीमेंट’ करार देते हुए अपने ‘X’ अकाउंट पर इसकी धज्जियां उड़ाईं। ईरान का तर्क है कि जब अमेरिका का संरक्षण सऊदी को नहीं बचा सका, तो तुर्की और पाकिस्तान क्या करेंगे? ईरान सवाल उठा रहा है कि क्या पाकिस्तान वाकई ईरान पर परमाणु हमला करने की हिम्मत जुटा पाएगा? या तुर्की अपने आर्थिक हितों को ताक पर रखकर ईरान से दुश्मनी मोल लेगा?
भारत के लिए बढ़ी चुनौती?
भारत के लिए यह समीकरण काफी पेचीदा है। एक तरफ सऊदी अरब के साथ भारत के रिश्ते सबसे सुनहरे दौर में हैं, वहीं पाकिस्तान और तुर्की का गठजोड़ हमेशा कश्मीर के मुद्दे पर भारत के खिलाफ जहर उगलता रहा है। यदि सऊदी के फंड से पाकिस्तान अपनी सैन्य मशीनरी को आधुनिक बनाता है और तुर्की की घातक तकनीक हासिल करता है, तो यह भारत की सुरक्षा के लिए एक नई चुनौती बन सकता है। हालांकि, दिल्ली को भरोसा है कि सऊदी अरब अपने सबसे बड़े आर्थिक बाजार (भारत) के हितों को कभी दांव पर नहीं लगाएगा।
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