ट्रम्प का ‘शांति’ अभियान: गाजा से पाकिस्तान तक, और हंसी के फुहारें!
डोनाल्ड ट्रम्प, क्रेडिट के भूखे, एक बार फिर दुनिया को अपनी “शांति” की दास्तान सुनाने निकल पड़े हैं। नोबेल पुरस्कार का सपना शायद अधूरा रह गया हो, पर शांति के प्रयासों में उनका जोर-शोर जारी है। मिस्र से आई एक ताज़ा ख़बर इसकी गवाही दे रही है, जहाँ ट्रम्प ने गाजा और इज़राइल के बीच युद्ध को “अपने दम पर” खत्म करवाने का डंका पीटा। इसके बाद, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ के साथ एक ऐसा पल आया, जिसने वहां मौजूद लोगों को हँसने पर मजबूर कर दिया। बिलकुल वैसे ही, जैसे कोई अभिभावक बच्चे से कहता है, “अच्छे बच्चे बनो, लड़ना बंद करो!” ट्रम्प ने शहबाज़ को “अच्छे से रहने” की सलाह दी, और शहबाज़ ने भी तुरंत हामी भर दी।
नोबेल का सपना और पाकिस्तान की चापलूसी: एक अजीब संगम
ट्रम्प ने एक बार फिर गाजा-इज़राइल युद्ध विराम का श्रेय खुद को दिया है। हालांकि, मिस्र में हुए इस “समझौते” में हमास की तरफ से कोई प्रतिनिधि मौजूद नहीं था, जिसने इस एकतरफा शांति पर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या यह सिर्फ कुछ दिनों की शांति है? ऐसे में, जब गाजा में शांति स्थापना पर अंतरराष्ट्रीय मंच पर गंभीर चर्चा चल रही थी, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ ने इस अवसर को ट्रम्प की चापलूसी में बदल दिया। शांति शिखर सम्मेलन के मंच से, शहबाज़ ने ट्रम्प को “शांति का मसीहा” घोषित करते हुए न सिर्फ उनकी खूब तारीफ की, बल्कि उन्हें एक बार फिर नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित करने का प्रस्ताव भी रख दिया।
‘सबसे महान दिन’ या ‘ट्रम्प के लिए मंच’? मेलोनी की खामोश प्रतिक्रिया
शहबाज़ के भाषण ने वहां मौजूद कई नेताओं को हैरान कर दिया। इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी का चेहरा एक गहरी सोच को दर्शा रहा था, मानो वे यह सोच रही हों कि यह मंच गाजा के गंभीर मुद्दे के लिए है या फिर ट्रम्प की प्रशंसा के लिए। शहबाज़ ने अपने भाषण की शुरुआत ट्रम्प के “अथक प्रयासों” की तारीफों से की और इसे “समकालीन इतिहास का सबसे महान दिन” बताया। उन्होंने यह भी दावा किया कि ट्रम्प की टीम ने पहले भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध रुकवाया और फिर दक्षिण एशिया में शांति लाई। एक बार फिर, पाकिस्तान ने भारत-पाक संघर्ष में ट्रम्प को झूठा श्रेय देने की कोशिश की।
पाकिस्तानी झूठ और असहज नेता: मेलोनी का मौन
पाकिस्तान एक बार फिर दुनिया को अपने झूठ से गुमराह करने की कोशिश कर रहा था। शहबाज़ अपनी चापलूसी में इतने मगन थे कि उन्हें शायद यह अहसास नहीं हुआ कि वहां मौजूद नेता किस कदर असहज महसूस कर रहे थे। मेलोनी की प्रतिक्रिया अपने आप में बहुत कुछ कह रही थी। ऐसे में, यह सवाल उठना लाजिमी है कि जिस मंच पर गाजा जैसे गंभीर मसले पर चर्चा होनी चाहिए, वहां पाकिस्तान के प्रधानमंत्री भारत-पाक संघर्ष को घसीटकर ट्रम्प को हीरो बनाने की कोशिश क्यों कर रहे थे?
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