ईरान की आग और ट्रंप का फैलता ‘रायता’: जब दावों के जाल में खुद उलझ गया व्हाइट हाउस
हिंदी की एक बड़ी मशहूर कहावत है—’रायता फैलाना’। इसका सीधा अर्थ है किसी बनी-बनाई योजना को बिगाड़ देना या ऐसी अव्यवस्था पैदा करना जिससे शर्मिंदगी झेलनी पड़े। जैसे सफेद दही से बना रायता जमीन पर गिरकर चारों तरफ गंदगी फैला देता है, ठीक वैसा ही कुछ इन दिनों वैश्विक राजनीति के मंच पर घट रहा है। अमेरिका को ‘महान’ बनाने का दावा करने वाले डोनाल्ड ट्रंप अब ‘दुनिया को महान’ बनाने की जिद में ईरान के साथ एक ऐसी उलझन मोल ले चुके हैं, जिसे समेटना अब खुद उनके लिए भी टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। ईरान के साथ छिड़ी इस जंग में ट्रंप के बयानों ने जो विरोधाभास पैदा किया है, उसने दुनिया को हैरान कर दिया है।
एक हफ्ते पहले जब इजराइल और अमेरिका ने ईरान पर बमबारी शुरू की, तो ट्रंप ने कहा कि इसका मकसद ईरानी जनता को विद्रोह के लिए उकसाना है। फिर इसे “आसन्न खतरे” का खात्मा बताया। इसके बाद बात ‘सत्ता परिवर्तन’ तक पहुंची और फिर ट्रंप ने यहां तक कह दिया कि ईरान का अगला नेता भी वही चुनेंगे। शुक्रवार आते-आते वे ‘बिना शर्त आत्मसमर्पण’ की मांग करने लगे। हैरानी की बात यह है कि इस दौरान उनके अपने अधिकारियों के बयान ट्रंप की बातों को काटते रहे। ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ के नाम से शुरू हुए इस अभियान में अयातुल्ला खामेनेई की हत्या और सैन्य अड्डों पर हमलों के बीच आज भी दुनिया यह नहीं समझ पा रही है कि आखिर ट्रंप चाहते क्या हैं।
पहला दिन: परमाणु खतरे के नाम पर ‘आज़ादी’ की पुकार
28 फरवरी को ट्रंप ने एक वीडियो संदेश के जरिए इस जंग का बिगुल फूँका। उन्होंने तेहरान पर मिसाइल विकसित करने और परमाणु महत्वाकांक्षा न छोड़ने का आरोप लगाया। उन्होंने वादा किया कि वे ईरान की नौसेना और मिसाइल उद्योग को नेस्तनाबूद कर देंगे। ट्रंप ने ईरानियों से कहा, “आपकी आजादी का वक्त आ गया है।” लेकिन उसी दिन के अंत तक उनका रुख बदल गया। ‘एक्सियोस’ से बात करते हुए उन्होंने कहा कि वे इस मामले को दो-तीन दिन में खत्म कर सकते हैं और ईरानियों से कह सकते हैं—’अगर फिर परमाणु कार्यक्रम शुरू किया, तो कुछ सालों में फिर मिलेंगे।’ इसी बीच संयुक्त राष्ट्र में आत्मरक्षा का कानूनी तर्क भी पेश कर दिया गया।
दूसरा और तीसरा दिन: दावों की हकीकत और बयानों की बाजीगरी
दूसरे दिन ट्रंप प्रशासन के अधिकारियों ने बंद कमरे में यह मान लिया कि उनके पास ऐसी कोई खुफिया जानकारी नहीं थी कि ईरान पहले हमला करने वाला था। यह व्हाइट हाउस के सार्वजनिक दावों के बिल्कुल उलट था। तीसरे दिन रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने मोर्चा संभाला। उन्होंने इसे एक ‘सटीक सैन्य अभियान’ बताया और साफ किया कि यह ‘सत्ता परिवर्तन’ का युद्ध नहीं है। हालांकि, उन्होंने यह जोड़ना नहीं भुला कि ‘सत्ता परिवर्तन’ तो हो ही गया है। कुछ ही घंटों बाद विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने एक अलग ही राग अलापा, जिससे प्रशासन के भीतर की खींचतान और साफ हो गई।
चौथा दिन: जब ट्रंप ने अपने ही विदेश मंत्री को झुकाया
3 मार्च को एक अजीब स्थिति पैदा हुई। ट्रंप ने अपने ही विदेश मंत्री रूबियो के स्पष्टीकरण को सार्वजनिक रूप से खारिज कर दिया। ट्रंप ने कहा कि हमला करने का फैसला पूरी तरह उनका था, न कि इजराइल की योजना से प्रेरित। उन्होंने पत्रकारों से कहा, “मुझे लगा कि वे (ईरान) पहले हमला करेंगे, और मैं यह नहीं चाहता था।” इसके बाद रूबियो को अपना बयान वापस लेना पड़ा।
पांचवां और छठा दिन: आसमान पर कब्जा और ‘नेता’ चुनने की ख्वाहिश
4 मार्च को पेंटागन ने दावा किया कि जल्द ही ईरान के आसमान पर सिर्फ अमेरिका और इजराइल का नियंत्रण होगा। लेकिन छठे दिन ट्रंप ने सबसे चौंकाने वाली बात कही। उन्होंने ईरान के भविष्य की तुलना वेनेजुएला से कर दी। ट्रंप ने कहा कि वे ईरान का नया नेता खुद चुनना चाहते हैं। उन्होंने खामेनेई के बेटे मोजतबा को एक ‘मामूली नेता’ बताकर खारिज कर दिया और कहा कि वे शांति लाने वाला व्यक्ति चाहते हैं।
सातवां दिन: समर्पण या महायुद्ध?
6 मार्च की सुबह तक ट्रंप का लहजा और सख्त हो गया। उन्होंने ‘बिना शर्त आत्मसमर्पण’ की मांग की और कहा कि इसके बाद ही अमेरिका ईरान के पुनर्निर्माण में मदद करेगा। हालांकि, उनकी प्रेस सचिव कैरोलिन लीविट ने इस बयान के असर को कम करने की कोशिश की, लेकिन तब तक ट्रंप का ‘फैलाया हुआ रायता’ पूरी दुनिया के सामने आ चुका था। जंग के सात दिन बीत जाने के बाद भी अमेरिका की रणनीति एक पहेली बनी हुई है, जिसे सुलझाने में खुद ट्रंप के सिपहसालार भी नाकाम दिख रहे हैं।
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