संयुक्त राष्ट्र महासभा: कश्मीर पर तुर्की के बार-बार के हस्तक्षेप पर भारत का दृढ़ रुख
संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) का मंच, जहाँ दुनिया की ज्वलंत समस्याओं पर गहन विमर्श और सामूहिक सहयोग की अपेक्षा की जाती है, दुर्भाग्यवश तुर्किये के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोआन द्वारा कश्मीर मुद्दे को बार-बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने के प्रयास से बाधित होता रहा है। इस वर्ष भी, अपने संबोधन में कश्मीर का जिक्र करते हुए, उन्होंने संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों के आधार पर समाधान का आह्वान किया और भारत-पाकिस्तान को ‘संवाद’ का सुझाव दिया। हालांकि यह वक्तव्य पहली नजर में शांति का पैगाम देता प्रतीत होता है, परंतु वस्तुतः यह पाकिस्तान के प्रति झुकाव और भारत के आंतरिक मामलों में अनुचित हस्तक्षेप को दर्शाता है।
भारत का दृष्टिकोण सदैव स्पष्ट और अटूट रहा है – कश्मीर भारत का अविभाज्य अंग है और रहेगा। भारत ने कभी भी किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता को स्वीकार नहीं किया है। यदि पाकिस्तान के साथ कोई भी वार्ता होती है, तो वह केवल इस एक बिंदु पर केंद्रित होगी कि पाकिस्तान अपने कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (PoJK) को भारत को कब सौंपेगा। इसके अलावा किसी भी प्रकार की बातचीत संभव नहीं है, और यह भी तभी संभव है जब पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को पूरी तरह से समाप्त कर दे।
तुर्की का दोहरा मापदंड: विनाशकारी भूकंप और आतंकवाद का समर्थन
यह विचारणीय है कि तुर्किये का कश्मीर पर निरंतर रुख उसकी विवादास्पद मानसिकता को उजागर करता है। स्मरण रहे कि फरवरी 2023 में आए विनाशकारी भूकंप के समय, जब भारत ने ‘ऑपरेशन दोस्त’ के तहत मानवीय सहायता प्रदान की, तब तुर्किये ने भारत की उदारता की सराहना करने के बजाय पाकिस्तान का पक्ष लिया, जो भारत की सुरक्षा और संप्रभुता के विरुद्ध था। भारत ने तत्काल राहत दल और चिकित्सा सहायता भेजी थी, परंतु तुर्किये ने उसका सम्मान नहीं किया। इसके विपरीत, वह पाकिस्तान के आतंकवादी तंत्र और रणनीतिक हितों को बढ़ावा देता रहा है।
‘ऑपरेशन सिंदूर’ इसका हालिया उदाहरण है। मई 2025 में पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले में 26 निर्दोष नागरिकों की जान गई। इस प्रतिक्रिया स्वरूप, भारत ने पाकिस्तान में आतंकवादी ठिकानों पर सटीक सैन्य कार्रवाई की। इन अभियानों के दौरान, पाकिस्तान को तुर्किये से ड्रोन सहायता प्राप्त हुई, जिसे भारतीय सुरक्षा बलों ने सफलतापूर्वक मार गिराया। यह घटना केवल सैन्य शक्ति का प्रदर्शन नहीं थी, बल्कि तुर्किये को यह स्पष्ट संदेश देने का प्रयास था कि भारत आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले तत्वों के प्रति किसी भी प्रकार के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष समर्थन को बर्दाश्त नहीं करेगा।
तुर्की-पाकिस्तान की दोस्ती: दक्षिण एशिया में सामरिक असंतुलन का खतरा?
अब सवाल यह उठता है कि तुर्किये और पाकिस्तान की यह बढ़ती दोस्ती आगे क्या रंग लाएगी? ऐतिहासिक रूप से, तुर्किये पाकिस्तान का एक प्रमुख रणनीतिक साझेदार रहा है। रक्षा सहयोग, ड्रोन प्रौद्योगिकी और इस्लामी दुनिया की राजनीति में उनकी निकटता स्पष्ट है। पाकिस्तान, चीन के साथ अपनी घनिष्ठता के माध्यम से पहले से ही भारत के लिए एक चुनौती पेश कर रहा है। ऐसे में, यदि तुर्किये का सैन्य सहयोग और बढ़ता है, तो यह दक्षिण एशिया में सामरिक असंतुलन पैदा करने का प्रयास हो सकता है। विशेषकर ड्रोन तकनीक, साइबर युद्ध और आतंकवादी संगठनों को रसद सहायता प्रदान करने के क्षेत्रों में उनके गठबंधन से भारत की सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती मिल सकती है।
भारत की सामरिक तैयारी और कूटनीतिक दृढ़ता
हालांकि, भारत की सुदृढ़ रणनीतिक तैयारी, सक्रिय कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय मंच पर विश्वसनीयता इस खतरे को प्रभावी ढंग से संतुलित करने में सक्षम है। भारत ने बार-बार यह साबित किया है कि वह किसी भी प्रत्यक्ष खतरे का सामना करने में पूर्णतः सक्षम है। चाहे 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक हो, 2019 की बालाकोट एयरस्ट्राइक हो या 2025 का ‘ऑपरेशन सिंदूर’ हो, भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि आतंकवाद का जवाब केवल शब्दों से नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई से दिया जाएगा।
कूटनीतिक स्तर पर भी, भारत ने तुर्किये की बयानबाजी का हमेशा कड़ा जवाब दिया है। संयुक्त राष्ट्र मंच पर भारतीय प्रतिनिधियों ने स्पष्ट किया है कि कश्मीर भारत का आंतरिक मामला है और किसी भी विदेशी हस्तक्षेप का कोई औचित्य नहीं है। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय तुर्किये की बयानबाजी को गंभीरता से नहीं लेता। अधिकांश देश भारत की संवैधानिक स्थिति और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को स्वीकार करते हैं।
घरेलू मजबूरियाँ और अल्पकालिक लाभ
इसके अतिरिक्त, तुर्किये और पाकिस्तान की दोस्ती का एक और पहलू यह है कि दोनों देश अपनी-अपनी आंतरिक समस्याओं से जूझ रहे हैं। पाकिस्तान आर्थिक तंगी की कगार पर है और उसकी राजनीति गहरे संकट में है। वहीं, तुर्किये की अर्थव्यवस्था भी कमजोर हो रही है और राष्ट्रपति एर्दोआन को घरेलू स्तर पर असंतोष का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में, कश्मीर मुद्दे को उठाना उनके लिए घरेलू राजनीति में अपनी छवि को सुधारने का एक तरीका भी हो सकता है। हालांकि, यह नीति अल्पकालिक है और दीर्घकाल में तुर्किये की विश्वसनीयता को ही नुकसान पहुंचाती है।
निष्कर्ष: अवसर में बदलता खतरा
संक्षेप में, तुर्किये द्वारा कश्मीर मुद्दे को बार-बार उठाना उसकी पाकिस्तान-समर्थक नीति और राजनीतिक मजबूरियों का परिणाम है। परंतु, भारत के लिए यह किसी चुनौती से अधिक एक अवसर है। यह भारत को अपनी दृढ़ता और स्पष्ट नीति के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह दिखाने का मौका देता है कि भारत आतंकवाद और तीसरे देशों के हस्तक्षेप के प्रति ‘जीरो टॉलरेंस’ रखता है। पाकिस्तान और तुर्किये की यह दोस्ती चाहे जितनी भी ‘विवादास्पद मानसिकता’ से प्रेरित हो, भारत की कूटनीति और सामरिक शक्ति उसे हर बार मात देने के लिए पर्याप्त है। संपूर्ण जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा था, है और हमेशा रहेगा – इस सच्चाई को न तो तुर्किये बदल सकता है, न ही पाकिस्तान।
Discover more from Aware Media News - Hindi News, Breaking News & Latest Updates
Subscribe to get the latest posts sent to your email.


