तुर्किये-पाकिस्तान धुरी: दक्षिण एशिया की बदलती भू-राजनीति और भारत की सुरक्षा पर नई दस्तक
एक पुरानी आदत, एक नया समीकरण:
कश्मीर पर पाकिस्तान को तुर्किये का समर्थन कोई नई बात नहीं है, यह उनकी दशकों पुरानी राजनीतिक परंपरा रही है। मगर, भारत अब तक इसे क्षेत्रीय समीकरणों के लिए एक मामूली चिंता के रूप में देखता रहा। तुर्किये की पहचान एक दूरस्थ नाटो (NATO) देश की रही है, जिसकी मुख्य रुचि पश्चिम एशिया और इस्लामी दुनिया में अपना दबदबा बनाने तक ही सीमित मानी जाती थी। लेकिन, राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोआन के नेतृत्व में तुर्किये का बढ़ता ध्यान अब सीधे दक्षिण एशिया की भू-राजनीतिक बिसात पर आ गया है, और यह बदलाव भारत की सुरक्षा सोच के लिए निश्चित रूप से नए प्रश्नचिन्ह खड़े कर रहा है।
‘ऑपरेशन सिंदूर’ का सबक और तुर्किये की बढ़ती दखल:
‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने वह हकीकत उजागर कर दी, जिसे शायद भारत अनजाने में नज़रअंदाज़ कर रहा था। भारत की पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान द्वारा किए गए ड्रोन हमलों में 300 से अधिक ड्रोन मार गिराए गए, जिनमें तुर्किये निर्मित ‘सोंगर’ (Songar) मॉडल के ड्रोन भी शामिल थे। इन ड्रोनों की क्षमता और मारक क्षमता किसी भी संघर्ष का रुख पलटने में सक्षम है। यह तथ्य कि तुर्किये की तकनीक और लक्ष्य-निर्धारण प्रणाली अब पाकिस्तानी सेना का अभिन्न अंग बन चुकी है, दोनों देशों के बीच साझेदारी की गहराई को दर्शाता है। इससे भी बढ़कर, जब अमेरिका से भारत को भेजे जा रहे अपाचे (Apache) हेलिकॉप्टरों का एक बेड़ा तुर्किये ने अपने हवाई क्षेत्र में रोक दिया, तो यह स्पष्ट संदेश था कि तुर्किये अब दक्षिण एशिया की शक्ति संतुलन की राजनीति में एक सक्रिय हस्तक्षेपकर्ता बन गया है। नाटो सदस्य का यह कदम, भारत के प्रति एक सीधा भू-राजनीतिक संकेत था।
विचारधारा का मेल, सामरिक साझेदारी का विस्तार:
यह गठजोड़ केवल सैन्य सहयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि एक वैचारिक सामंजस्य भी इसमें निहित है। दोनों देश कट्टर सुन्नी पहचान और मुस्लिम जगत में नेतृत्व की महत्वाकांक्षा साझा करते हैं। पाकिस्तान को तुर्किये से आधुनिक तकनीक और अंतरराष्ट्रीय मंच पर वैधता मिलती है, जबकि तुर्किये को पाकिस्तान के सैन्य कौशल, विशाल बाजार और दक्षिण एशिया में प्रवेश का अवसर प्राप्त होता है। वर्ष 2000 के बाद से, 1,500 से अधिक पाकिस्तानी सैन्य अधिकारी तुर्किये में प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके हैं। नौसेना के क्षेत्र में, MILGEM श्रेणी के युद्धपोतों और पनडुब्बियों के उन्नयन ने इस रणनीतिक जुड़ाव को और गहरा किया है। पाकिस्तानी इंजीनियर तुर्किये के महत्वाकांक्षी पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान ‘TAI KAAN’ पर भी काम कर रहे हैं, जो तुर्किये को वैश्विक हथियार उद्योग में एक नया मुकाम दिलाने का प्रयास है।
लड़ाकू विमानों से लेकर पायलट प्रशिक्षण तक, सहयोग का विस्तृत जाल:
तुर्किये और पाकिस्तान के बीच सहयोग अब लड़ाकू विमानों की इंजीनियरिंग, पायलट प्रशिक्षण और उन्नत तकनीकी क्षेत्रों तक फैल चुका है। तुर्किये ने न केवल पाकिस्तान के F-16 विमानों का उन्नयन किया है, बल्कि इंजन और पुर्जे भी तैयार किए हैं, साथ ही पाकिस्तानी वायुसेना के अधिकारियों को प्रशिक्षित भी किया है। दोनों देशों के बीच 52 ‘सुपर मुश्शेक’ (Super Mushshak) ट्रेनर विमानों का सौदा भी हुआ है। 2016 में हुए तख्तापलट के प्रयास के बाद, जब तुर्किये पायलटों की कमी से जूझ रहा था, तब पाकिस्तान ने अपने पायलटों को प्रशिक्षण देकर उसकी वायुसेना को मजबूती प्रदान की थी। आज, दोनों देश ‘TF-KAAN’ जैसे अगली पीढ़ी के लड़ाकू विमानों पर संयुक्त रूप से काम कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त, ASELSAN द्वारा JF-17 लड़ाकू विमानों के लिए उन्नत टार्गेटिंग पॉड और HAVELSAN द्वारा इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर प्रशिक्षण रेंज जैसे प्रावधान, पाकिस्तान की सैन्य क्षमताओं को सीधे तौर पर बढ़ाते हैं और अप्रत्यक्ष रूप से भारत पर दबाव बनाते हैं।
भारत का प्रत्युत्तर: रणनीतिक संतुलन की दिशा में कदम:
यह एक सकारात्मक संकेत है कि भारत ने तुर्किये की इस बढ़ती सक्रियता को अनदेखा नहीं किया है। भारत के ग्रीस, साइप्रस और आर्मेनिया जैसे देशों के साथ संबंध आज पहले से कहीं अधिक मजबूत हुए हैं – ये सभी राष्ट्र तुर्किये के रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी माने जाते हैं। इसके साथ ही, इज़राइल, यूएई, सऊदी अरब और मिस्र जैसे देशों के साथ भारत की बढ़ती नज़दीकियां तुर्किये के क्षेत्रीय प्रभाव को सीमित करती हैं। सैन्य दृष्टि से भी, भारत की क्षमताएं तुर्किये और पाकिस्तान की संयुक्त शक्ति से काफी आगे हैं। इसलिए, यह खतरा अस्तित्वगत नहीं है, बल्कि एक रणनीतिक व्यवधान है जो ड्रोन युद्ध, तकनीकी हस्तांतरण और क्षेत्रीय दबाव जैसे क्षेत्रों में भारत के लिए नई चुनौतियां पेश कर रहा है।
आगे की राह: भारत को क्या करना चाहिए?
इस बदलते परिदृश्य में, भारत को अपनी तकनीकी निर्यात नियंत्रण को और कड़ा करने की आवश्यकता है, ताकि कोई भी भारतीय तकनीक अनजाने में पाकिस्तान तक न पहुंच सके। साथ ही, काउंटर-ड्रोन और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर क्षमताओं का तेजी से विकास आवश्यक है। इसके अलावा, क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वियों के साथ रणनीतिक संवाद को और मजबूत करना होगा। संक्षेप में, तुर्किये और पाकिस्तान की यह साझेदारी भारत के लिए एक वास्तविक चुनौती तो है, लेकिन इसका दायरा सीमित ही है।
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