डिप्लोमेसी का नया अध्याय: ट्रूडो युग की कड़वाहट भुलाकर अब भारत के साथ ‘बड़ी डील’ की तैयारी में मार्क कार्नी
यूरोपीय यूनियन के साथ ऐतिहासिक फ्री ट्रेड एग्रीमेंट की सफलता के बाद, भारत के लिए कूटनीतिक मोर्चे पर एक और बड़ी और सुखद खबर सामने आ रही है। कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी मार्च के पहले सप्ताह में भारत के आधिकारिक दौरे पर आ सकते हैं। जस्टिन ट्रूडो के कार्यकाल में द्विपक्षीय रिश्तों में जो बर्फ जम गई थी, कार्नी अब उसे पिघलाकर एक नई शुरुआत करने की पुरजोर कोशिश में जुटे हैं। इस संभावित यात्रा का मुख्य एजेंडा यूरेनियम, क्रिटिकल मिनरल्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में बड़े समझौतों पर मुहर लगाना है।
रिश्तों को पटरी पर लाने की इस कवायद की शुरुआत टेलीफोनिक बातचीत से हो चुकी है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कनाडा की विदेश मंत्री अनीता आनंद से फोन पर विस्तृत चर्चा की। जयशंकर ने सोशल मीडिया पर इस संवाद की पुष्टि करते हुए बताया कि दोनों देशों के बीच आर्थिक साझेदारी और एआई जैसे क्षेत्रों में उच्चस्तरीय सहयोग को गहरा करने पर विशेष जोर दिया गया है। यह बातचीत ऐसे नाजुक वक्त में हुई है जब अमेरिका ने कनाडा के पीएम कार्नी के चीन दौरे पर नाखुशी जाहिर की है। नवनिर्वाचित राष्ट्रपति ट्रंप ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि कनाडा ने चीन के साथ व्यापारिक समझौता किया, तो कनाडाई सामानों पर 100% टैरिफ लगाया जा सकता है। ऐसे में कनाडा में भारत के उच्चायुक्त का यह बयान कि ‘कार्नी जल्द भारत आ सकते हैं’, दोनों देशों के बीच बढ़ते भरोसे का बड़ा संकेत है।
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भारत: कनाडा का नया रणनीतिक और आर्थिक ढाल
मौजूदा वैश्विक हालातों में कनाडा अपनी व्यापारिक नीतियों में बड़ा बदलाव कर रहा है। कनाडा का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार अमेरिका है, लेकिन डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ संबंधी धमकियों ने ओटावा को चिंता में डाल दिया है। हाल ही में दावोस में कार्नी ने स्पष्ट किया था कि मौजूदा दौर में ‘मिडल पावर्स’ (मध्यम शक्तियों) को एकजुट होकर काम करना होगा। उनके बयान और हालिया फैसले संकेत देते हैं कि कनाडा अब केवल अमेरिका पर निर्भर रहने के बजाय अपने व्यापारिक रिश्तों में विविधता लाना चाहता है।
भारत इस रणनीति में कनाडा के लिए सबसे भरोसेमंद और सशक्त साझेदार बनकर उभरा है। कार्नी के संभावित दौरे में आर्थिक रिश्तों को नई ऊंचाई देने के लिए बड़े फैसले लिए जाएंगे। दरअसल, भारत-कनाडा संबंधों में बदलाव की नींव पिछले साल 13 अक्टूबर को ही पड़ गई थी, जब विदेश मंत्री अनीता आनंद ने भारत का दौरा किया था। अपनी अर्थव्यवस्था को अमेरिकी दबाव से बचाने और वैश्विक अनिश्चितता के बीच एक स्वतंत्र रास्ता बनाने के लिए अब कनाडा को भारत जैसे मजबूत सहयोगी की सख्त जरूरत है। भारतीय उच्चायुक्त दिनेश पटनायक ने भी इस बात की पुष्टि की है कि दोनों देश एक नई दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रहे हैं।
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