नयी दिल्ली, चार नवंबर। क्या भारत बैटरी निर्माण के मामले में दुनिया से पिछड़ रहा है? एक चौंकाने वाली रिपोर्ट के सामने आने से यह सवाल गहरा गया है। इसके अनुसार, भारत में बैटरी के कलपुर्जे बनाने की उत्पादन लागत विदेशों से आयात होने वाले सामानों की तुलना में 60 प्रतिशत तक अधिक है। यह अहम खुलासा उद्योग संगठन ‘नेट जीरो एनर्जी ट्रांजिशन अलायंस’ (एनईटीआरए) और अन्य प्रतिष्ठित संस्थाओं की इस सप्ताह जारी की गई एक संयुक्त रिपोर्ट में हुआ है। रिपोर्ट बताती है कि देश में कैथोड, एनोड सामग्री, इलेक्ट्रोलाइट, सेपरेटर और तांबे की पन्नी का उत्पादन करने वाली कंपनियों की लागत आयातित उत्पादों के मुकाबले 18 से 61 प्रतिशत तक ज्यादा बैठती है।
दिलचस्प बात यह है कि इस रिपोर्ट को भारी उद्योग मंत्रालय द्वारा जारी किया गया है, जिसे एनईटीआरए ने एआरसीआई, सीएसआईआर-एनसीएल, आईआईटी मद्रास और डेलॉयट के सहयोग से तैयार किया है। इसमें भारत की 20 से अधिक अग्रणी कंपनियों के वित्तीय आंकड़ों का बारीकी से विश्लेषण किया गया है।
यह रिपोर्ट ऐसे बेहद अहम समय पर आई है, जब केंद्र सरकार देश के भीतर ही बैटरी कलपुर्जे के विनिर्माण को बढ़ावा देने और घरेलू उद्योगों को मजबूत करने के लिए एक विशेष योजना लाने पर गंभीरता से विचार कर रही है। ‘एक्सेलरेटिंग इंडियाज एसीसी कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम’ नाम की इस रिपोर्ट ने वैश्विक बैटरी आपूर्ति श्रृंखला पर चीन के लगभग एकछत्र राज और उसके दबदबे की ओर भी गंभीर इशारा किया है। नेट जीरो एनर्जी ट्रांजिशन के सह-संस्थापक एवं कार्यकारी निदेशक देबी प्रसाद दास ने इस पर प्रकाश डालते हुए बताया कि ये लागत संबंधी आंकड़े सीधे उन भारतीय कंपनियों से जुटाए गए हैं जो या तो ऐसे संयंत्र स्थापित कर चुकी हैं या फिर इन्हें लगाने की पूरी योजना बना रही हैं।
उन्होंने आगे स्पष्ट किया कि अलग-अलग कलपुर्जों की मैन्युफैक्चरिंग में इस भारी-भरकम लागत अंतर के पीछे कई अलग-अलग कारण छिपे हैं। वहीं, एनईटीआरए के संस्थापक एवं अध्यक्ष राहुल वालावलकर ने इसके व्यावहारिक पहलू पर रोशनी डालते हुए बताया कि बाजार में उतरने वाले नए विनिर्माताओं को शुरुआती पांच से छह साल तक उत्पादन प्रक्रिया के दौरान सामग्री की अधिक बर्बादी जैसी बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। रिपोर्ट के आंकड़ों पर गौर करें तो बैटरी सेल के कुल विनिर्माण खर्च में अकेले इन कलपुर्जों की हिस्सेदारी लगभग 76 प्रतिशत तक होती है।
आने वाले दिनों में इस सेक्टर की मांग में भारी उछाल आने की उम्मीद है। अनुमान है कि देश में बैटरी की जो मांग वर्ष 2025 में लगभग 33 गीगावाट घंटे (जीडब्ल्यूएच) रहने वाली है, वह रॉकेट की रफ्तार से बढ़कर 2032 में 236 जीडब्ल्यूएच और साल 2037 तक लगभग 600 जीडब्ल्यूएच के विशाल आंकड़े को छू जाएगी।
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