कच्चे तेल के दामों में ‘बड़ी गिरावट’: अमेरिका-ईरान तनाव के बीच बाजार को मिली राहत, जानें आपकी जेब पर क्या होगा असर
अमेरिका और ईरान के बीच फारस की खाड़ी (Persian Gulf) में जारी सैन्य तनातनी में लगातार दूसरे दिन हमलों पर लगे ‘ब्रेक’ ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों को अर्श से फर्श पर ला दिया है। युद्ध की आशंकाओं के बीच इस अस्थायी शांति ने वैश्विक क्रूड सप्लाई में तुरंत रुकावट की चिंताओं को फिलहाल टाल दिया है, जिसके परिणामस्वरूप ट्रेडर्स ने जमकर मुनाफावसूली (Profit-Booking) की। गौर करने वाली बात यह है कि पिछले हफ्ते मध्य पूर्व में सुलगते तनाव के कारण ही कच्चे तेल की कीमतें दो महीने के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई थीं।
बीते सप्ताह, ब्रेंट क्रूड ने कुछ समय के लिए 102 डॉलर प्रति बैरल के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर लिया था, जो मई के बाद का उच्चतम स्तर था। इस महीने की शुरुआत के मुकाबले बेंचमार्क कीमतों में करीब 30 डॉलर का उछाल आया था, क्योंकि मध्य पूर्व में छिड़े संघर्ष ने एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध का डर पैदा कर दिया था, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजार पूरी तरह चरमरा सकता था।
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मिडिल ईस्ट के तनाव ने भड़काई तेल की आग
पूरे महीने मध्य पूर्व में सैन्य तनाव के चलते तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखा गया। निवेशकों को इस बात का गहरा डर था कि यदि ईरान सीधे तौर पर युद्ध में शामिल हुआ, तो दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण एनर्जी कॉरिडोर से क्रूड की सप्लाई ठप हो सकती है। बाजार की सबसे बड़ी चिंता ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ (Strait of Hormuz) को लेकर है, जो ईरान के तट के पास स्थित एक रणनीतिक जलमार्ग है। दुनिया के कुल तेल निर्यात का लगभग पांचवां हिस्सा इसी संकरे रास्ते से होकर गुजरता है। फरवरी के अंत में अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान पर हमले शुरू होने के बाद से यहां शिपिंग गतिविधियां बुरी तरह प्रभावित हुई हैं, जिससे लंबे समय तक सप्लाई बाधित रहने का खतरा मंडरा रहा है।
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हालांकि, कई तेल निर्यातक देशों ने वैकल्पिक रास्तों से सप्लाई भेजने की कोशिश की, लेकिन वे विकल्प भी सुरक्षित नहीं रहे। खबरों के मुताबिक, पिछले सप्ताह लाल सागर मार्ग का इस्तेमाल कर रहे सऊदी तेल टैंकरों पर भी हमले हुए, जिससे वैश्विक ऊर्जा परिवहन का जोखिम और बढ़ गया। सप्लाई में कमी का सीधा असर क्रूड की कीमतों पर पड़ता है, जिससे दुनिया भर में ईंधन और परिवहन लागत का बोझ बढ़ जाता है।
ईंधन की कीमतें और महंगाई: आम आदमी की बढ़ती फिक्र
कच्चे तेल की कीमतों में आई हालिया तेजी ने आम लोगों की जेब पर असर डालना शुरू कर दिया है। मोटर क्लब AAA के आंकड़ों के अनुसार, रविवार को अमेरिका में रेगुलर पेट्रोल की औसत कीमत 4.11 डॉलर प्रति गैलन दर्ज की गई, जबकि महज एक महीने पहले यह 3.90 डॉलर और पिछले साल इसी दौरान 3.15 डॉलर थी।
विशेषज्ञों की चेतावनी है कि यदि तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहीं, तो माल ढुलाई महंगी हो जाएगी, जिससे किराने के सामान से लेकर रोजमर्रा की हर चीज के दाम बढ़ सकते हैं। यह संकट ऐसे वक्त में आया है जब अमेरिकी अर्थव्यवस्था रफ्तार पकड़ रही है, लेकिन ईरान के साथ तनाव ने उपभोक्ताओं के भरोसे को डगमगा दिया है। तेल की कीमतों में उछाल ने महंगाई पर काबू पाने की सरकारी कोशिशों को भी झटका दिया है।
CME ग्रुप के डेटा के मुताबिक, ट्रेडर्स अब 36% संभावना जता रहे हैं कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व अपनी अगली बैठक में ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर सकता है। आमतौर पर महंगाई थामने के लिए ब्याज दरें बढ़ाई जाती हैं, लेकिन इससे आम परिवारों और बिजनेस के लिए कर्ज लेना महंगा हो जाता है, जिससे आर्थिक विकास की गति धीमी पड़ सकती है।
हाउसिंग सेक्टर और AI निवेश पर संकट के बादल
ब्याज दरें बढ़ने की आशंका का असर अभी से दिखने लगा है। लंबे समय के मॉर्गेज रेट (होम लोन दरें) एक साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गए हैं, जिससे घरों की मांग में गिरावट आई है। इसके अलावा, कर्ज महंगा होने से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) इंफ्रास्ट्रक्चर और AI डेटा सेंटर जैसे क्षेत्रों में निवेश धीमा पड़ सकता है, जो वर्तमान में अमेरिकी अर्थव्यवस्था के नए इंजन बने हुए हैं।
कीमतों में बड़ी गिरावट, लेकिन अभी भी जोखिम बरकरार
रविवार को आई गिरावट के बावजूद, तेल की कीमतें इस महीने की शुरुआत की तुलना में अभी भी ऊंचे स्तर पर हैं। सितंबर डिलीवरी के लिए बेंचमार्क US क्रूड शुक्रवार को 3.1% और फिर 5.6% गिरकर 84.34 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया। वहीं, ब्रेंट क्रूड 4.6% की गिरावट के साथ 87.48 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ। यह गिरावट दर्शाती है कि सप्लाई को लेकर तत्काल जोखिम भले ही कम हुआ हो, लेकिन मध्य पूर्व की अनिश्चितता अभी खत्म नहीं हुई है।
बाजार की नजर अब भी मिडिल ईस्ट पर क्यों है?
हालांकि नए हमलों का न होना एक राहत की खबर है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि हालात अभी भी बारूद के ढेर पर हैं। यदि होर्मुज जलडमरूमध्य या अन्य प्रमुख शिपिंग रास्तों पर फिर से तनाव भड़कता है, तो कीमतों में दोबारा उछाल आ सकता है। निवेशक अब इस क्षेत्र की हर सैन्य हलचल और सेंट्रल बैंक के फैसलों पर पैनी नजर रखे हुए हैं।
ग्लोबल इकोनॉमी पर क्या होगा दूरगामी असर?
कच्चे तेल में आई हालिया गिरावट से बाजारों ने राहत की सांस ली है, लेकिन अर्थशास्त्रियों का मानना है कि एक-दो दिन की गिरावट से महंगाई का दबाव कम नहीं होगा। ऊर्जा की लागत सीधे तौर पर मैन्युफैक्चरिंग, ट्रांसपोर्टेशन और रिटेल सेक्टर को प्रभावित करती है। यदि कीमतें लंबे समय तक स्थिर रहती हैं, तभी फ्यूल और इनपुट कॉस्ट में कमी आएगी, जिससे महंगाई कम हो सकती है। फिलहाल, पूरी दुनिया की नजर मिडिल ईस्ट के जियोपॉलिटिकल हालात और आने वाली मॉनेटरी पॉलिसी पर टिकी है, क्योंकि यही दोनों कारक वैश्विक अर्थव्यवस्था का भविष्य तय करेंगे।
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