बिहार की रणभूमि: चुनावी बिसात बिछी, 10% मतदाता बने ‘वंचित’
बिहार विधानसभा चुनाव की जंग का बिगुल बज चुका है! राज्य की 243 सीटों के लिए मतदान दो चरणों में 6 और 11 नवंबर को होगा, और 14 नवंबर को मतों की गिनती के साथ ही जनता की राय का फैसला सामने आ जाएगा। वहीं, पहले चरण की चुनावी दौड़ के लिए नामांकन का अंतिम दिन आज, शुक्रवार को है।
सी.पी.आई (एम.एल.) की रणनीति: पिछली बार से मिलती-जुलती, पर मंशा अलग
सी.पी.आई (एम.एल.) के सूत्रों के अनुसार, पार्टी इस बार भी करीब उतनी ही सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी, जितनी पिछली बार लड़ी थी। याद दिला दें कि पिछले विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 19 सीटों पर किस्मत आजमाई थी और शानदार प्रदर्शन करते हुए 12 पर जीत दर्ज की थी।
सत्ता की डोर थामने की मंशा? सी.पी.आई (एम.एल.) ने दिए संकेत
सी.पी.आई (एम.एल.) ने यह भी साफ कर दिया है कि यदि आर.जे.डी. के नेतृत्व वाला गठबंधन सत्ता में आता है, तो उनकी पार्टी सरकार में शामिल होने से पीछे नहीं हटेगी। पार्टी के नेता भट्टाचार्य ने कहा, “सरकार में शामिल होना कोई वर्जित बात नहीं है। पिछली बार हम महागबंधन सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे थे, क्योंकि हमें नीतीश कुमार के साथ लंबे समय तक रहने का भरोसा नहीं था। हमारी आशंका सही साबित हुई जब वे एन.डी.ए. में लौट गए।”
2020 का महाठबंधन बनाम 2024: समीकरणों में बदलाव, नए साथी
भट्टाचार्य ने 2020 के महागठबंधन का जिक्र करते हुए बताया कि तब आर.जे.डी., कांग्रेस, सी.पी.आई (एम.एल.), सी.पी.आई और सी.पी.आई (एम) जैसे दल साथ थे। इस बार, इस गठबंधन में पूर्व मंत्री मुकेश सहनी की विकासशील इंसान पार्टी (वी.आई.पी.) भी शामिल हो गई है। इसके अलावा, झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की झामुमो के साथ भी कुछ सीमावर्ती जिलों की सीटों को लेकर बातचीत जारी है।
‘एस.आई.आर.’ पर उठे सवाल: 10% मतदाताओं के मताधिकार पर ग्रहण?
वहीं, भट्टाचार्य ने एक गंभीर आरोप लगाया है। उनका दावा है कि विशेष गहन पुनरीक्षण (एस.आई.आर.) की प्रक्रिया ने राज्य के लगभग 10 प्रतिशत मतदाताओं को उनके मतदान के अधिकार से वंचित कर दिया है। उन्होंने कहा, “यह ऐसी कवायद थी, जिसका कोई उदाहरण न बिहार में है, न किसी और राज्य में। चुनाव आयोग का दावा है कि मतदाता सूची को शुद्ध किया गया है, लेकिन इसमें पहले से अधिक गड़बड़ियां हैं। हमने पहले ही चेताया था कि 2 से 2.5 करोड़ मतदाता अपने अधिकार से वंचित हो सकते हैं। हमारी लड़ाई से कुछ हद तक यह रोका जा सका, पर अब भी हर दसवां मतदाता का नाम काट दिया गया है।”
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