120 बहादुर: वीरता की अनकही गाथा, जो सिनेमाई पर्दे पर जीवंत हो उठी
भारत भूमि शौर्य, साहस और बलिदान की अनगिनत गाथाओं से ओत-प्रोत है। ये वीरगाथाएँ हमने सुनी-सुनाई हैं, पढ़ी-लिखी हैं, और अब सिनेमाई पर्दे पर भी जीवंत होती दिख रही हैं, जो युवा पीढ़ी को प्रेरित करती हैं। कारगिल युद्ध के नायकों से लेकर लोंगेवाला युद्ध पर बनी ‘बॉर्डर’ तक, अब इस फेहरिस्त में फरहान अख्तर की ‘120 बहादुर’ भी शामिल हो गई है। यह फिल्म 1962 के भारत-चीन युद्ध की पृष्ठभूमि पर आधारित है।
कहानी का आरम्भ और देशभक्ति का जज्बा
फिल्म का पर्दा 18 नवंबर, 1962 की तारीख के साथ खुलता है, जहां एक जवान बर्फीली पहाड़ियों से नीचे की ओर भागता हुआ आता है, गिर पड़ता है और अगले ही पल मिलिट्री अस्पताल में पाया जाता है। इसके बाद कहानी फ्लैशबैक में चली जाती है। 13वीं कुमाऊं रेजिमेंट के कमांडर मेजर शैतान सिंह भाटी और उनके 120 बहादुर जवान चुशूल में युद्ध की आशंका के बीच हैं। मेजर शैतान सिंह को अहसास हो जाता है कि चीन चुशूल एयरबेस पर कब्ज़ा करके पूरे लद्दाख और जम्मू-कश्मीर को हड़पना चाहता है। लेकिन, मेजर शैतान सिंह और उनके 120 जांबाज सैनिकों ने चीनी इरादों को नाकाम कर दिया। फिल्म इसी असाधारण वीरता की कहानी कहती है, और इसे जिस तरह से पर्दे पर उतारा गया है, वह दर्शकों को बांधे रखता है।
कलाकारों का अभिनय और निर्देशन की छाप
मेजर शैतान सिंह के किरदार में फरहान अख्तर ने अपने अभिनय में किसी भी प्रकार की नाटकीयता को हावी नहीं होने दिया। इस फिल्म की एक बड़ी खूबी यह है कि एक युद्ध फिल्म होने के बावजूद इसमें अनावश्यक मेलोड्रामा या बनावटीपन से परहेज किया गया है। हालांकि, कुछ दृश्यों में फरहान अख्तर मेजर शैतान सिंह के रूप में थोड़े कमज़ोर लगते हैं और उनकी संवाद अदायगी भी फीकी पड़ जाती है। पत्नी के किरदार में राशी खन्ना, कम स्क्रीन स्पेस के बावजूद अपनी छाप छोड़ने में कामयाब रही हैं। इसके अलावा, स्पर्श वालिया, देवेंद्र अहिरवार, दिग्विजय प्रताप, ब्रिजेश करनावल और साहिब वर्मा जैसे कई नवोदित कलाकारों ने भी अपना डेब्यू किया है और ‘निकले हैं हम घर से’ जैसे गाने से लेकर क्लाइमेक्स के वॉर फाइट सीक्वेंस तक, हर जगह अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराई है। कुछ जगहों पर तो ये कलाकार फरहान अख्तर पर भी भारी पड़ते दिखाई देते हैं।
तकनीकी उत्कृष्टता और कहानी का ताना-बाना
राजीव जी मेनन द्वारा लिखी गई पटकथा में वास्तविकता को बनाए रखा गया है। बैटल ऑफ रेजांग ला की कहानी सबको ज्ञात है, लेकिन राजीव मेनन ने इसे इस तरह से प्रस्तुत किया है कि दर्शक उस पर सहजता से विश्वास कर सकें। न कोई चीख-चिल्लाहट वाले संवाद, न ही परिवार वालों का अत्यधिक मेलोड्रेमैटिक चित्रण। रजनीश घई का निर्देशन सराहनीय है, जिन्होंने लद्दाख की खूबसूरत वादियों में फिल्म को खूबसूरती से फिल्माया है। सिनेमैटोग्राफर तेत्सुआ नगाता ने दृश्यों को अत्यंत सुंदर और प्रभावी ढंग से कैद किया है। मेजर शैतान सिंह और चीनी अधिकारी के आमने-सामने वाले दृश्यों को फिक्स्ड फ्रेम में जिस तरह से उकेरा गया है, वह देखने लायक है। फिल्म तकनीकी रूप से काफी कसी हुई बनी है। सतीश रघुनाथन का बैकग्राउंड स्कोर भी लाउड नहीं है, बल्कि हर दृश्य की आवश्यकता के अनुसार ही इस्तेमाल किया गया है, जिससे फिल्म उबाऊ नहीं लगती।
वीरता को सलाम, एक अविस्मरणीय प्रस्तुति
‘120 बहादुर’ उन वीर जवानों को एक सच्ची श्रद्धांजलि है, जिन्होंने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान दे दिया। उनके ब्रिगेड कमांडर ने तीन महीने तक उनकी शहादत को स्वीकार नहीं किया, और जब रेजांग ला की पहाड़ियों से बर्फ हटी, तब उन सभी जवानों के शव मिले। यह फिल्म उस समय की कहानी है, जब 17 नवंबर की रात को कुछ ऐसा हुआ, जिसकी कल्पना चीन भी नहीं कर सकता था। यह फिल्म उन देशवासियों की गाथा है, जिन्हें अपने परिवार से अधिक चिंता अपनी भारत माँ की थी। 15 से 18 नवंबर, 1962 के बीच का मंजर इस फिल्म के माध्यम से जीवंत हो उठता है। यह फिल्म परिवार के साथ बैठकर देखने लायक है।
कलाकार: फरहान अख्तर, राशी खन्ना, विवान भटना, अंकित सिवाच, ब्रिजेश करनावल, देवेंद्र अहिरवार, दिग्विजय प्रताप
सिनेमैटोग्राफी: तेत्सुआ नगाता
निर्देशन: रजनीश घई
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