‘गुस्ताख़ इश्क़’ का ताज़ा जायज़ा: ओल्ड स्कूल रोमांस और यादगार किरदार
शशांक मणि पांडेय
अपडेटेड: शुक्रवार, 28 नवंबर, 2025, 11:10 [IST]
‘ऊल जलूल इश्क़’ के नाम से चर्चा बटोरने वाली फिल्म अब ‘गुस्ताख़ इश्क़’ के रूप में दर्शकों के सामने आ चुकी है। 28 नवंबर को रिलीज हुई इस फिल्म में विजय वर्मा, फातिमा सना शेख और नसीरुद्दीन शाह जैसे मंझे हुए कलाकार हैं। फिल्म की खासियत इसका ‘ओल्ड स्कूल’ अंदाज़ है, चाहे वो इश्क हो, रोमांस हो या फिर कविताएँ। आइए जानें, कैसी है ये फिल्म और क्या है इसकी कहानी।
कहानी का ताना-बाना:
कहानी दिल्ली के नवाबुद्दीन (विजय वर्मा) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपने पिता की आखिरी निशानी, उनके प्रिंटिंग प्रेस को बचाने के जद्दोजहद में जुटा है। तभी उसकी मुलाकात महान कवि अज़ीज़ से होती है, जो कभी उसके पिता के ज़माने में काफी मशहूर थे, पर अचानक शोहरत से दूर चले गए। पिता के लेखन को पढ़कर नवाबुद्दीन उन्हें ढूंढने का फैसला करता है, ताकि वो अज़ीज़ की शायरी छापकर अपने पिता के प्रेस को बचा सके। आखिरकार उसे अज़ीज़ का नंबर मिल ही जाता है, जहाँ उसकी मुलाकात अज़ीज़ की बेटी मन्नत उर्फ मिनी (फातिमा सना शेख) से होती है। पहली ही मुलाक़ात में मिनी उसे बताती है कि अज़ीज़ अब खत नहीं लिखते और उसे जाने को कहती है। लेकिन नवाबुद्दीन हार मानने वालों में से नहीं, उसे अज़ीज़ की दुकान का पता मिल जाता है और वो उनसे सीधे मिलने पहुँच जाता है। यहीं से नवाबुद्दीन अज़ीज़ से शायरी सीखने की इच्छा जाहिर करता है। कहानी में आगे क्या मोड़ आता है, ये तो फिल्म देखकर ही पता चलेगा।
अभिनय का जादू:
नवाबुद्दीन के किरदार में विजय वर्मा ने अपने नाम के अनुरूप बेहतरीन काम किया है। उनकी एक्टिंग का अंदाज हमेशा की तरह दमदार है और फातिमा सना शेख के साथ उनकी केमिस्ट्री भी खूब जम रही है। फातिमा ने भी अपने काम से सबको चौंकाया है। फिल्म जिस दशक की कहानी कह रही है, फातिमा ने उस दौर को और शायरी के अंदाज़ को बखूबी पकड़ा है। उन्हें जितना भी स्क्रीन टाइम मिला है, उन्होंने उसे अपनी एक्टिंग से न्याय दिलाया है। नसीरुद्दीन शाह के आने से लेकर फिल्म के अंत तक, उनकी मौजूदगी फिल्म में एक अलग रंग भर देती है। उन्होंने पूरी फिल्म को अपने कंधों पर उठाए रखा है। वहीं, शारिब हाशमी को फिल्म में क्यों लिया गया है, ये समझ से परे है। मेकर्स उन्हें ठीक से इस्तेमाल ही नहीं कर पाए।
लेखन और निर्देशन का सफर:
विभु पुरी ने फिल्म को लिखा और डायरेक्ट किया है। लेखन के मोर्चे पर वो कुछ हद तक नाकाम रहे। फिल्म का पहला हाफ ठीक-ठाक है, कुछ भी असाधारण नहीं है। विभु की स्टोरीटेलिंग थोड़ी फीकी है। हालांकि, कहानी में वो पुरानी यादें और एक मिठास है, जो आजकल की फिल्मों में कम ही देखने को मिलती है। मेकर्स 90 के दशक का माहौल दिखाने में कामयाब हुए हैं, जिसने फिल्म को एक गर्माहट और दिल को छू लेने वाला एहसास दिया है। फिल्म के डायलॉग्स और शायरी इसके अहम हिस्से हैं। संगीत औसत दर्जे का और भूलने लायक है। वहीं, फिल्म का सेकंड हाफ धीमा और थोड़ा कमजोर लगता है। बस, क्लाइमेक्स आपको थोड़ा भावुक कर देता है। निर्देशन के लिहाज़ से विभु का काम अच्छा है।
अंतिम निष्कर्ष:
कुल मिलाकर, मेकर्स का यह एक अच्छा प्रयास था। पर ‘गुस्ताख़ इश्क़’ में थोड़ी बहुत ‘गुस्ताखी’ बाकी रह गई, जिसके चलते फिल्म उस स्तर तक नहीं पहुँच पाई और एक औसत फिल्म बनकर रह गई।
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