वर्ष 2007 में पर्दे पर उतरी ‘गांधी मेरे पिता’, निर्देशक फिरोज अब्बास खान की एक ऐसी कृति है जो राष्ट्रपिता और उनके पुत्र हरिलाल के बीच के अनकहे तनावों को गहराई से उकेरती है। अक्षय खन्ना, दर्शन जरीवाला, शेफाली शाह और भूमिका चावला के दमदार अभिनय से सजी यह फिल्म गांधीजी के अडिग सिद्धांतों और उनके पारिवारिक जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों की एक मर्मस्पर्शी झलक पेश करती है। पिता-पुत्र के जटिल रिश्तों और व्यक्तिगत अंतर्द्वंद्व को दर्शाती यह फिल्म भावनाओं की एक अनूठी यात्रा है।
दूसरी ओर, साल 2006 में राजकुमार हिरानी के निर्देशन में बनी ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ ने गांधीवादी विचारधारा को एक बेहद नए और दिलचस्प अंदाज में दुनिया के सामने रखा। संजय दत्त, अरशद वारसी और विद्या बालन अभिनीत यह कॉमेडी-ड्रामा फिल्म दिखाती है कि कैसे ‘गांधीगिरी’ के जरिए एक अपराधी का हृदय परिवर्तन होता है और वह सत्य, अहिंसा व प्रेम की राह चुन लेता है। यह फिल्म न केवल मनोरंजन करती है, बल्कि आज के आधुनिक समाज में बापू के विचारों की प्रासंगिकता को भी बड़ी खूबसूरती से सिद्ध करती है।
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