सज्जन कुमार की मौत के बाद दिल्ली की राजनीति में शोक और सियासत आमने-सामने दिखाई दे रहे हैं। तालकटोरा स्टेडियम में हुई शोक सभा के बीच बीजेपी के तीन सांसदों के उनके आवास पर जाने को लेकर पार्टी के भीतर नाराजगी की चर्चा तेज हो गई है।
तालकटोरा स्टेडियम में जुटे सैकड़ों लोग
दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में शनिवार, 29 अगस्त को कांग्रेस के पूर्व सांसद सज्जन कुमार के लिए शोक सभा आयोजित की गई। परिवार की ओर से जारी जानकारी के मुताबिक, इसमें दिल्ली और आसपास के राज्यों से कई नेता पहुंचे। सामाजिक और धार्मिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने भी उन्हें श्रद्धांजलि दी।
लेकिन इस शोक सभा के साथ दिल्ली की राजनीति में एक अलग बहस भी शुरू हो गई है। वजह है बीजेपी के कुछ सांसदों का सज्जन कुमार के निधन के बाद उनके आवास पर जाकर शोक व्यक्त करना।
बीजेपी के तीन सांसदों पर नाराजगी?
पार्टी सूत्रों के मुताबिक, बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन ने दिल्ली के तीन सांसदों—कमलजीत सहरावत, रामवीर सिंह बिधूड़ी और योगेंद्र चंदोलिया—के कदम पर नाराजगी जताई है।
बताया गया कि तीनों सांसद सज्जन कुमार के निधन के बाद उनके आवास पर शोक व्यक्त करने पहुंचे थे। पार्टी के भीतर इस कदम को लेकर सवाल उठने की बात सामने आई है, खासकर इसलिए क्योंकि बीजेपी लंबे समय से 1984 के सिख-विरोधी दंगों में कांग्रेस नेताओं की कथित भूमिका को लेकर कांग्रेस पर हमला करती रही है।
एचएस फूलका ने किया पार्टी अध्यक्ष का समर्थन
बीजेपी नेता और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील एचएस फूलका ने इस मामले में पार्टी अध्यक्ष के रुख की सराहना की। उन्होंने 1984 के दंगों को लेकर बीजेपी की लंबे समय से चली आ रही राजनीतिक लड़ाई का हवाला दिया।
फूलका ने तीनों सांसदों के सज्जन कुमार के घर जाने की आलोचना करते हुए उनके बहिष्कार की मांग भी की। उनके बयान ने इस मामले को पार्टी के अंदरूनी अनुशासन से आगे बढ़ाकर 1984 के दंगों की राजनीतिक विरासत से जोड़ दिया है।
1984 दंगों में सज्जन कुमार की भूमिका का मामला
सज्जन कुमार लंबे समय से 1984 के सिख-विरोधी दंगों से जुड़े मामलों को लेकर विवादों में रहे। दिल्ली हाई कोर्ट ने दिसंबर 2018 में उन्हें पांच सिखों की हत्या और एक गुरुद्वारे को जलाने के मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
दोषी ठहराए जाने के बाद उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया था। फरवरी 2025 में दिल्ली की एक अदालत ने दो सिखों की हत्या से जुड़े एक अन्य मामले में भी उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
अस्पताल में हुई थी मौत
तबीयत बिगड़ने के बाद सज्जन कुमार को 20 अगस्त को तिहाड़ जेल से सफदरजंग अस्पताल लाया गया था। अस्पताल के अनुसार, उन्हें बचाने के लिए रिससिटेशन और लाइफ-सपोर्ट उपाय किए गए, लेकिन दोपहर करीब 12:30 बजे उनकी मौत हो गई।
उनकी मृत्यु के बाद परिवार की ओर से आयोजित शोक सभा में बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी ने उनके लंबे राजनीतिक जीवन और विवादित विरासत, दोनों को फिर चर्चा में ला दिया।
शोक और राजनीतिक रुख के बीच टकराव
सज्जन कुमार के निधन पर शोक व्यक्त करना और उनके राजनीतिक अतीत पर रुख रखना—दोनों अलग-अलग सवाल हैं। लेकिन 1984 के दंगों को लेकर बीजेपी की दशकों पुरानी राजनीति के बीच उसके सांसदों का उनके घर जाना पार्टी के लिए असहज सवाल जरूर खड़े करता है।
राजनीति में रिश्ते और संवेदनाएं अक्सर विचारधारा की कठोर सीमाओं से टकराती हैं। सज्जन कुमार की शोक सभा के बहाने एक बार फिर यही सवाल सामने है कि राजनीतिक विरोध की सीमा क्या हो और मानवीय संवेदना की जगह कहां से शुरू होती है।
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