भारत-ऑस्ट्रेलिया रक्षा सहयोग: एक नए युग का सूत्रपात
ऑस्ट्रेलिया की राजधानी कैनबरा में भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और ऑस्ट्रेलियाई उपप्रधानमंत्री व रक्षा मंत्री रिचर्ड मार्ल्स के बीच हुई ऐतिहासिक बैठक ने द्विपक्षीय रक्षा संबंधों को एक अभूतपूर्व ऊंचाई पर पहुंचा दिया है। बारह वर्षों के अंतराल के बाद किसी भारतीय रक्षा मंत्री की यह पहली आधिकारिक यात्रा थी, जिसने न केवल रक्षा उद्योग में सहयोग के द्वार खोले हैं, बल्कि दोनों देशों के बीच सामरिक विश्वास की एक नई नींव भी रखी है।
इस महत्वपूर्ण दौरे के दौरान, दोनों देशों के बीच कई महत्वपूर्ण समझौते और घोषणाएँ की गईं, जिन्होंने भविष्य के रक्षा सहयोग की दिशा तय की है। प्रमुख समझौते इस प्रकार हैं:
- परस्पर पनडुब्बी बचाव सहयोग करार: यह समझौता दोनों देशों की नौसेनाओं को आपातकालीन परिस्थितियों में पनडुब्बी बचाव के लिए महत्वपूर्ण तकनीकी और मानवीय सहायता प्रदान करने में सक्षम बनाएगा। इससे हिंद महासागर क्षेत्र में दोनों देशों की परिचालन क्षमता और विश्वसनीयता में वृद्धि होगी।
- वायु-से-वायु ईंधन पुनर्भरण समझौते की प्रगति: वर्ष 2024 से लागू होने वाली यह व्यवस्था दोनों देशों की वायुसेनाओं की अंतर-संचालन क्षमता को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगी।
- संयुक्त स्टाफ वार्ता की शुरुआत: थल, जल, वायु और अंतरिक्ष सहित सभी परिचालन क्षेत्रों में समन्वय को मजबूत करने के लिए यह एक संस्थागत तंत्र के रूप में कार्य करेगा।
- प्रशिक्षण सहयोग का विस्तार: भारतीय अधिकारियों को 2026 से ऑस्ट्रेलियाई डिफेंस कॉलेज में प्रशिक्षण मिलेगा, और 2027 में पहली बार एक भारतीय अधिकारी ऑस्ट्रेलियाई डिफेंस फोर्स एकेडमी में स्थायी पद पर आसीन होगा।
- आधुनिक रक्षा तकनीकों पर सहयोग: मानवरहित विमान प्रणाली (UAS), काउंटर-UAS, एकीकृत वायु एवं मिसाइल रक्षा, और सुरक्षित संचार प्रणाली जैसे क्षेत्रों में साझा अनुसंधान और उत्पादन पर सहमति व्यक्त की गई है।
- नौसैनिक रखरखाव में भारत की भूमिका: भारत ने ऑस्ट्रेलियाई नौसेना के जहाजों की मरम्मत और परिचालन संबंधी कार्य (MRO) अपने शिपयार्डों में करने का प्रस्ताव दिया है, जिससे भारतीय रक्षा विनिर्माण उद्योग को वैश्विक स्तर पर एक महत्वपूर्ण बढ़ावा मिलेगा।
- संयुक्त समुद्री सुरक्षा सहयोग रोडमैप: हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सामूहिक निगरानी, समुद्री मार्गों की सुरक्षा और अवैध गतिविधियों की रोकथाम के लिए एक विस्तृत कार्ययोजना तैयार की गई है।
- संयुक्त समुद्री गश्त और पनडुब्बी-रोधी अभ्यास: दोनों नौसेनाएँ हिंद महासागर क्षेत्र में संयुक्त गश्त और ASW (Anti-Submarine Warfare) अभ्यास जारी रखेंगी।
- एक-दूसरे के क्षेत्रों से समुद्री विमान संचालन: दोनों देशों ने एक-दूसरे के एयरबेस से समुद्री विमानों की तैनाती की अनुमति देने पर सहमति जताई है, जो उनके बीच बढ़ते सामरिक विश्वास का प्रतीक है।
- क्वॉड सहयोग की पुनर्पुष्टि: दोनों पक्षों ने क्वॉड समूह (भारत, ऑस्ट्रेलिया, जापान, अमेरिका) के तहत समन्वय को और मजबूत करने की घोषणा की और 2025 में ‘मालाबार अभ्यास’ के दौरान दूसरी क्वॉड समुद्री जागरूकता गतिविधि आयोजित करने का निर्णय लिया।
- वार्षिक रक्षा संवाद का विस्तार: यह तय हुआ कि रिचर्ड मार्ल्स 2026 में भारत की यात्रा करेंगे, जिससे वार्षिक रक्षा मंत्रिस्तरीय संवाद को और आगे बढ़ाया जा सके।
इन करारों का सामरिक महत्व बहुआयामी है। यह भारत-ऑस्ट्रेलिया संबंधों को ‘कॉम्प्रिहेन्सिव स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप’ से आगे ले जाकर एक ‘ऑपरेशनल पार्टनरशिप’ की ओर अग्रसर करता है। अब दोनों देशों की सेनाएँ केवल संयुक्त अभ्यासों तक सीमित न रहकर, वास्तविक परिचालन स्तर पर भी एक-दूसरे की सहायता करने में सक्षम होंगी।
हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच, यह साझेदारी संतुलन के नए समीकरण तैयार करती है। भारत और ऑस्ट्रेलिया, दोनों ही लोकतांत्रिक, समुद्री और संसाधन-संपन्न राष्ट्र हैं, जिनकी सुरक्षा चिंताएँ समान हैं, विशेष रूप से दक्षिण चीन सागर, अंडमान सागर और दक्षिण-पश्चिमी प्रशांत के क्षेत्रों में। यह गठजोड़ उस “रूल-बेस्ड ऑर्डर” की रक्षा के लिए एक निर्णायक कदम है, जिसकी पैरवी भारत लंबे समय से करता रहा है।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य में, यह करार केवल द्विपक्षीय संबंधों का विस्तार नहीं है, बल्कि क्वॉड और इंडो-पैसिफिक रणनीति की एक ठोस अभिव्यक्ति भी है। यह अमेरिका, जापान और अन्य लोकतांत्रिक देशों को यह संकेत देता है कि हिंद-प्रशांत में सुरक्षा सहयोग का नया केंद्र तेजी से विकसित हो रहा है। वहीं, यह चीन को भी स्पष्ट संदेश देता है कि भारत और ऑस्ट्रेलिया अब सामरिक दृष्टि से स्वतंत्र, परंतु परस्पर सहयोगी रणनीति अपना रहे हैं, जिससे क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन में परिवर्तन की संभावना है।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की यह यात्रा भारत की रक्षा कूटनीति का एक नया अध्याय है। “मेक इन इंडिया” और “डिफेंस इंडस्ट्रियल कोऑपरेशन” के माध्यम से भारत अब रक्षा उपकरणों का केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि एक निर्माता और साझेदार के रूप में उभर रहा है।
ऑस्ट्रेलिया के साथ यह करार न केवल हिंद-प्रशांत की सुरक्षा को सुदृढ़ करेगा, बल्कि भारत की वैश्विक रणनीतिक स्थिति को भी नई प्रतिष्ठा प्रदान करेगा। यदि यह सहयोग रक्षा उत्पादन, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और सामुद्रिक निगरानी के क्षेत्र में वास्तविक रूप लेता है, तो यह भारत को न केवल एक क्षेत्रीय शक्ति, बल्कि एक वैश्विक सुरक्षा प्रदाता के रूप में स्थापित कर सकता है।
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