इंदिरा गांधी: एक अविस्मरणीय पुण्यतिथि और अनसुनी दास्तान
आज, 31 अक्टूबर, भारत की एक असाधारण बेटी, पहली और एकमात्र महिला प्रधानमंत्री, इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि है। 41 साल पहले, इसी दिन, उनकी गोलियों से छलनी करके हत्या कर दी गई थी। यह वो दिन था जब भारत ने अपनी ‘लौह महिला’ को खो दिया, वो भी अपनों के हाथों। उनके अपने ही दो अंगरक्षक, बेअंत सिंह और सतवंत सिंह, ने उन्हें उनके आवास पर ही, सुबह सवा नौ बजे, गोलियों से छलनी कर दिया था। आज, इस दुखद अवसर पर, हम इंदिरा गांधी को नमन करते हैं और उस दिन की उन अनसुनी घटनाओं पर प्रकाश डालते हैं जो उनकी हत्या के बाद घटीं।
ऑपरेशन ब्लू स्टार: कड़वा सच जिसने हत्या को जन्म दिया
इंदिरा गांधी के जीवन का एक विवादास्पद अध्याय था ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’। 30 अक्टूबर 1984 को, ओडिशा के भुवनेश्वर में दिए गए अपने अंतिम भाषण में, उन्होंने देश सेवा के अपने संकल्प को दोहराया था। उन्होंने कहा था, “मैं बहुत जीवन जी चुकी हूं और अगर अब मुझे मौत भी आ जाए, तो कोई बात नहीं। मुझे इस बात का गर्व है कि मेरा पूरा जीवन सेवा में गुजरा है। मेरे शरीर के खून का एक-एक कतरा देश की सेवा के काम आएगा।” यह उनके जीवन का अंतिम भाषण साबित हुआ।
उनके इस भाषण के ठीक अगले दिन, सुबह 9 बजकर 15 मिनट पर, उनके सुरक्षा गार्ड बेअंत सिंह और सतवंत सिंह ने उन्हें गोली मार दी। इस भयानक कृत्य का मूल कारण था स्वर्ण मंदिर में चलाया गया ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’। इस ऑपरेशन का उद्देश्य सिख अलगाववादी नेता जरनैल सिंह भिंडरावाले और उनके समर्थकों को स्वर्ण मंदिर से बाहर निकालना था। यह आतंकवाद के खिलाफ एक साहसिक सैन्य कार्रवाई थी, लेकिन इसने कुछ सिख सुरक्षाकर्मियों को आहत किया, जिनके मन में गहरा असंतोष पनप गया। इसी असंतोष ने अंततः इंदिरा गांधी की हत्या को जन्म दिया।
गोलियों की आवाज और सोनिया गांधी की चीखें
वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई, जिन्होंने सोनिया गांधी की जीवनी “Sonia: A Biography” लिखी है, ने अवेयर मीडिया न्यूज़ के साथ एक विशेष बातचीत में उस भयावह क्षण का वर्णन किया। जब इंदिरा गांधी पर हमला हुआ, तो गोलियों की आवाज गूंज उठी। सोनिया गांधी, जिन्होंने अभी-अभी बाल धोए थे और उन्हें सुखा नहीं पाई थीं, पहले तो उन्हें दिवाली के पटाखों की आवाज समझीं। लेकिन जैसे ही उन्हें असली स्थिति का अहसास हुआ, वह दौड़ पड़ीं, चीखने लगीं, “मम्मी-मम्मी!”।
स्थिति इतनी विकट थी कि उन्हें अस्पताल ले जाने के लिए एंबुलेंस भी उपलब्ध नहीं थी। सोनिया गांधी, सफ़ेद एंबेसडर कार में, गाउन पहने हुए, अपनी माँ का सिर गोद में लिए एम्स की ओर रवाना हुईं। शायद तब तक उनकी साँसें थम चुकी थीं। सोनिया गांधी उस सदमे में थीं जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है।
मौत की घोषणा में पांच घंटे का इंतजार
जब इंदिरा गांधी को एम्स ले जाया गया, तो उनकी हालत अत्यंत गंभीर थी। एम्स की तत्कालीन डायरेक्टर, डॉ. स्नेह भार्गव, ने कई इंटरव्यू और अपनी किताब में बताया कि जब प्रधानमंत्री को अस्पताल लाया गया, तो किसी को भी इस बारे में कोई जानकारी नहीं थी। वह उस समय क्लास ले रही थीं, तभी उन्हें सूचना मिली। जब वह हड़बड़ी में वहाँ पहुंचीं, तो उन्होंने देखा कि प्रधानमंत्री एक स्ट्रेचर पर पड़ी हैं, खून से लथपथ, और स्ट्रेचर पर कोई चादर तक नहीं थी।
डॉक्टरों ने तुरंत जांच की और पाया कि उनकी नब्ज नहीं चल रही थी। फिर भी, उन्हें उम्मीद थी कि शायद दिल को फिर से चालू किया जा सकता है और सांसें लौट सकती हैं। डॉक्टरों ने पूरी कोशिश की, खून चढ़ाया जा रहा था, लेकिन शरीर से खून उसी रफ्तार से बह भी रहा था। दोपहर दो बजे के बाद, डॉक्टरों को यह अहसास हुआ कि अब कुछ नहीं किया जा सकता है और इंदिरा गांधी नहीं लौट सकतीं। इसी के साथ, उनकी मौत की घोषणा हुई, जिसमें कुल पांच घंटे का वक्त लगा।
मौत का अहसास और प्रियजनों से विदाई
रशीद किदवई अपनी किताब में लिखते हैं कि इंदिरा गांधी अक्सर अपने पोते-पोतियों, राहुल और प्रियंका से उन विषयों पर भी बात करती थीं जिन पर वह राजीव और सोनिया से भी चर्चा नहीं करती थीं। उन्होंने राहुल से जिम्मेदारी संभालने की बात की थी और यहां तक कि अपनी मौत पर रोने से भी मना किया था। उन्होंने राहुल को अंतिम संस्कार के बारे में भी बताया था और कहा था कि उन्होंने अपना जीवन जी लिया है।
जिस दिन इंदिरा गांधी की हत्या हुई, उन्होंने अपने पोते-पोतियों से बेहद प्यार से मुलाकात की थी। प्रियंका ने उस दिन महसूस किया था कि उनकी दादी ने उन्हें सामान्य से कुछ ज्यादा देर तक गोद में बिठाया था। उस समय राहुल गांधी 14 साल के और प्रियंका गांधी 12 साल की थीं।
भारी बुलेटप्रूफ जैकेट से इनकार: भरोसा या नियति?
ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद, इंदिरा गांधी को अपने सिख सुरक्षाकर्मियों को हटाने और घर पर भी बुलेटप्रूफ जैकेट पहनने की सलाह दी गई थी। लेकिन उन्होंने यह कहते हुए इनकार कर दिया था कि उन्हें भारी-भरकम जैकेट पहनना पसंद नहीं है। सुरक्षा गार्डों के बीच भेदभाव उन्हें स्वीकार नहीं था, और उन्हें अपने सुरक्षागार्डों पर बहुत भरोसा था।
रशीद किदवई ने अपनी किताब में पीसी अलेक्जेंडर, जो उनके सचिव थे, का जिक्र किया है। अलेक्जेंडर कहते थे कि उन्हें जून 1984 से ही एक डर सता रहा था। इंदिरा गांधी को बच्चों के अपहरण की साजिशों की आशंका थी। उनके मन में मौत का अहसास घर कर गया था, फिर भी उन्होंने अपने किसी भी सिख सुरक्षा गार्ड को नहीं हटाया, क्योंकि वह उन पर भरोसा करती थीं।
देश में भड़का था सिख विरोधी दंगा
इंदिरा गांधी की हत्या के बाद, देश में “खून के बदले खून” का दौर शुरू हो गया था। सिखों को खुलेआम निशाना बनाया गया। कई लोगों की हत्या की गई और अनगिनत लोगों को जिंदा जला दिया गया। केवल दिल्ली में ही 2500 से अधिक लोगों की जान गई थी। देश के अन्य हिस्सों में भी सिखों के खिलाफ हिंसा भड़क उठी थी।
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