जलेस का 11वां राष्ट्रीय सम्मेलन: संस्कृति की रक्षा और जनवाद की आवाज
बांदा, उत्तर प्रदेश – प्रेम सिंह बगिया के शांत सभागार में, डॉ. चंचल सिंह के कुशल नेतृत्व में, जनवादी लेखक संघ (जलेस) के 11वें राष्ट्रीय सम्मेलन का भव्य शुभारंभ हुआ। इस महत्वपूर्ण आयोजन का उद्घाटन सत्र, जहाँ एक ओर संस्कृति पर मंडरा रहे खतरों की ओर इशारा करता है, वहीं दूसरी ओर जनवाद और आम जनता की आवाज़ को बुलंद करने का संकल्प भी दोहराता है।
संस्कृति पर संकट और जनवाद की ललकार
उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि, प्रख्यात वैज्ञानिक गौहर रज़ा ने, आज सबसे बड़े खतरे के रूप में संस्कृति पर हो रहे हमलों को रेखांकित किया। उन्होंने इस लड़ाई को मिल-जुलकर लड़ने की आवश्यकता पर बल दिया और कहा कि आम लोगों तक पहुँचने के लिए उनकी बोलियों और भाषाओं तक पहुँचना अत्यंत आवश्यक है। श्री रज़ा ने उर्दू अदब में जनवाद की गहरी जड़ों की बात करते हुए, महान शायर फैज अहमद फैज के शब्दों का हवाला दिया, यह बताने के लिए कि कैसे 132 शब्दों की शायरी भी सत्ता प्रतिष्ठानों को भयभीत कर सकती है।
संविधान पर हमले और महिलाओं की भूमिका
मुख्य अतिथि के तौर पर बोलते हुए, कॉमरेड सुभाषिनी अली ने वर्तमान सरकार पर संविधान पर हमला करने और मनुस्मृति को लागू करने की मंशा का गंभीर आरोप लगाया। उन्होंने महिलाओं की सामाजिक भागीदारी के महत्व पर भी अपने विचार व्यक्त किए। इस सत्र में, जन संस्कृति मंच के महासचिव मनोज सिंह और प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) के प्रतिनिधि खान फारूक खान ने, प्रलेस के महासचिव सुखदेव सिंह सिरसा का शुभकामना संदेश पढ़ा।
किसानों की व्यथा और लेखकों का आह्वान
प्रेम सिंह ने उद्घाटन सत्र में किसानों की मार्मिक व्यथा पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि आज देश में किसानों की स्थिति अत्यंत गंभीर है, संसद में उनकी आवाज़ सुनने वाला कोई नहीं है। उन्होंने उपस्थित लेखकों का आह्वान करते हुए कहा कि वे किसानों की आवाज़ बनें। इस सत्र का कुशल संचालन डॉ. संजीव ने किया। तीन दिवसीय इस राष्ट्रीय सम्मेलन में उत्तर प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, हरियाणा, बिहार, झारखंड, गुजरात, दिल्ली, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों से लगभग 300 प्रतिनिधि शामिल हुए, जिनमें झारखंड से 24 प्रतिनिधियों का विशेष योगदान रहा।
दलितों, आदिवासियों की आवाज और सांस्कृतिक लड़ाई
सम्मेलन के दौरान, विषयक विचार गोष्ठी में राजस्थान से आए भंवर मेघवंशी ने दलित विमर्श पर बोलते हुए कहा कि दलितों को शोषण सहने की नियति बन चुकी है, लेकिन वे खामोश हैं। झारखंड से नीतीशा खलखो ने आदिवासियों की दयनीय स्थिति पर चिंता जताते हुए, आदिवासी नेतृत्व को मजबूत करने और संघर्ष को तेज करने की आवश्यकता पर बल दिया, ताकि शोषण से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त हो सके।
अपनी धारदार कविताओं और तीखे व्यंग्य के लिए विख्यात कवि संपत सरल ने इस सांस्कृतिक लड़ाई को हास्य-व्यंग्य, चुटकुलों और जनगीतों से लड़ने की बात कही। उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से सत्ता पर करारा प्रहार किया और मीडिया पर कटाक्ष करते हुए कहा कि यदि 1947 से पहले टीवी चैनल होते, तो शायद देश आज आज़ाद नहीं होता। शुभा ने धर्म के उदार चेहरे के गायब होने और उसके क्रूर चेहरे के सत्ता से समझौते पर चिंता व्यक्त की।
लोकतंत्र, पूंजी और जन आंदोलनों की एकजुटता
एक विचारोत्तेजक वक्तव्य में कहा गया कि लोकतंत्र पूंजी के काम की चीज नहीं है, इसलिए सत्ता, पूंजी और आज की मीडिया इसे खत्म करना चाहती है। इस ढांचे में संघर्ष करना कठिन है। इसके बजाय, सभी जातियों और धर्मों के लोगों को साथ लेकर सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक आंदोलनों की धार को तेज करने की आवश्यकता है। शाहीन बाग के आंदोलन का भी इस संदर्भ में उल्लेख किया गया।
सम्मेलन के अध्यक्षीय भाषण के साथ, डॉ. अली इमाम खान, मनमोहन और राम प्रकाश त्रिपाठी की अध्यक्षता वाली मंडली ने सभा का संचालन किया। बजरंग बिहारी तिवारी ने भी संचालन में अपनी भूमिका निभाई। दूसरे सत्र के समापन के बाद, एक सांस्कृतिक कार्यक्रम का भी आयोजन किया गया, जिसने सम्मेलन में एक खुशनुमा माहौल जोड़ा।
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