झारखंड की राजनीति में उबाल: सोरेन-भाजपा गठबंधन की अटकलें और ‘इंडिया’ गठबंधन पर सवाल
झारखंड की सियासत इस वक्त एक ऐसे दौर से गुज़र रही है जहाँ हवाएँ तेज़ी से बदल रही हैं। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और उनकी पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) का भाजपा के साथ संभावित गठजोड़, राजनीतिक गलियारों में नई चर्चाओं को जन्म दे रहा है। हालाँकि, झामुमो, कांग्रेस और राजद तीनों ही इस तरह की अटकलों को महज़ अफवाह बता रहे हैं, लेकिन घटनाओं का ताना-बाना कुछ और ही इशारा कर रहा है।
सब कुछ तब शुरू हुआ जब मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और उनकी पत्नी कल्पना सोरेन के दिल्ली में लंबे समय तक रुकने और भाजपा नेताओं से मुलाकातों की खबरें सामने आईं। इसी बीच, झारखंड के राज्यपाल संतोष गंगवार का केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से मिलना, इस पूरे घटनाक्रम को और भी रहस्यमय बना गया।
गठबंधन के भीतर तनाव की आहट
यह सब तब हो रहा है जब झामुमो, कांग्रेस और राजद के गठबंधन में अंदरूनी कलह की खबरें लगातार गरमा रही हैं। बिहार विधानसभा चुनावों में सीट बंटवारे को लेकर झामुमो और महागठबंधन के बीच हुई तनातनी किसी से छिपी नहीं है। झामुमो का आरोप था कि कांग्रेस और राजद ने उन्हें जानबूझकर हाशिए पर धकेल दिया, जबकि वे महागठबंधन का एक अहम हिस्सा थे। उस वक्त, झामुमो ने ‘इंडिया’ गठबंधन में अपनी भूमिका पर पुनर्विचार करने की बात भी कही थी। ऐसा लगता है कि यही अनबन अब झारखंड के भीतर भी तनाव का माहौल बना रही है।
दिल्ली से रांची तक: पारिवारिक मजबूरी या राजनीतिक पैंतरा?
दिल्ली में कई दिनों तक गुज़ारने के बाद सोरेन दंपति विधानसभा के शीतकालीन सत्र, जो 5 दिसंबर से शुरू हो रहा है, से ठीक पहले रांची लौट चुके हैं। झामुमो का कहना है कि दिल्ली का दौरा पारिवारिक और स्वास्थ्य संबंधी कारणों से था, और मुख्यमंत्री ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) से जुड़े मामलों पर कानूनी सलाह भी ली।
दूसरी ओर, कांग्रेस ने भाजपा पर “अफवाहें फैलाने” का आरोप लगाया है और कहा है कि गठबंधन पूरी तरह से मजबूत है। वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर और मंत्री दीपिका पांडे सिंह ने भी सियासी उथल-पुथल की खबरों को पूरी तरह से निराधार बताया है।
राजनीतिक समीकरणों का गणित: एक नई संभावना?
हालांकि, राजनीतिक विश्लेषक इस दावे से सहमत नहीं दिखते। उनका मानना है कि विधानसभा में विधायकों की संख्या अपने आप में फेरबदल की संभावना को बढ़ाती है। झामुमो के 34, कांग्रेस के 16, राजद के 4 और वाम दलों के 2 विधायकों के साथ गठबंधन फिलहाल 56 सीटों पर टिका है। वहीं, यदि झामुमो अपने 34 विधायकों के साथ भाजपा के 21 विधायकों और अन्य छोटे दलों जैसे एलजेपीआर, एजेएसयू, जदयू के साथ मिलकर नया समीकरण बनाता है, तो यह संख्या 58 तक पहुँच सकती है। यह आंकड़ा वर्तमान गठबंधन से अधिक है और एक स्थिर बहुमत के लिए पर्याप्त हो सकता है।
कांग्रेस के भीतर भी यह चिंता है कि अगर झामुमो ने ऐसा मन बना लिया, तो कांग्रेस के कुछ विधायक पाला बदल सकते हैं। हालाँकि, दल-बदल कानून के कारण यह रास्ता इतना आसान नहीं होगा। ऐसे किसी भी कदम के लिए कम से कम 11 कांग्रेस विधायकों का एक साथ दल छोड़ना आवश्यक होगा।
भाजपा की चुप्पी और विपक्ष की चिंता
भाजपा ने सार्वजनिक रूप से किसी भी गठबंधन की संभावना से इनकार किया है और सोरेन सरकार पर “भ्रष्टाचार में डूबी” होने का आरोप लगाया है। लेकिन राजनीतिक हवाएँ कुछ और ही बता रही हैं। ऐसा लगता है कि भाजपा परदे के पीछे से समर्थन देने के विकल्प पर विचार कर सकती है, खासकर अगर इससे कांग्रेस कमजोर होती है और झारखंड में सत्ता का समीकरण बदलता है।
दिल्ली में हुई मुलाक़ातें, झामुमो-कांग्रेस-राजद के बीच बढ़ती दूरी के संकेत, जैसे साझा मंचों पर अनुपस्थिति, कार्यक्रमों का रद्द होना और आपसी संवाद में कमी, इस बात की पुष्टि करते हैं कि झारखंड की राजनीति एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। सवाल यह है कि क्या हेमंत सोरेन वास्तव में भाजपा के साथ हाथ मिलाने के लिए तैयार हैं, या यह सब कुछ महागठबंधन के भीतर दबाव बनाने की राजनीति का एक नया अध्याय है?
‘इंडिया’ गठबंधन पर गहराता संकट
झारखंड की यह राजनीतिक उठापटक महज़ एक राज्य तक सीमित नहीं है; इसका सीधा असर उस व्यापक विपक्षी फ्रेमवर्क पर भी पड़ रहा है जिसे ‘इंडिया गठबंधन’ के नाम से देश भर में बनाया गया था। हेमंत सोरेन, जो आदिवासी राजनीति के एक प्रमुख चेहरे हैं, यदि इस गठबंधन से अलग होते हैं, तो इसका प्रतीकात्मक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर गहरा प्रभाव पड़ेगा।
सबसे पहले, झारखंड जैसे संसाधन-संपन्न राज्य में कांग्रेस और राजद की पकड़ कमजोर हो जाएगी। दूसरा, विपक्षी एकता की वह कहानी, जिसे अब भी मजबूत बताने की कोशिश की जा रही है, उसे एक बड़ा झटका लगेगा। इसके अलावा, बिहार में हार, पश्चिम बंगाल में ठहराव और अब झारखंड की अनिश्चितता, ये तीनों मिलकर ‘इंडिया गठबंधन’ की साख पर सवाल खड़े करते हैं। यदि हेमंत सोरेन भाजपा के समर्थन से नई सरकार बनाते हैं, तो यह न केवल झारखंड की राजनीति को उलट देगा, बल्कि विपक्ष के लिए एक मनोवैज्ञानिक हार भी साबित होगी। इसलिए, महागठबंधन और ‘इंडिया ब्लॉक’ के लिए यह केवल एक राज्य का संकट नहीं है; यह उनकी विश्वसनीयता की परीक्षा है।
Discover more from Aware Media News - Hindi News, Breaking News & Latest Updates
Subscribe to get the latest posts sent to your email.
