लद्दाख की पुकार: जब भारत की अंतरात्मा जागेगी?
हालिया हिंसा से उपजी लद्दाख की वेदना ने देश की संसद को झकझोर दिया है। कांग्रेस नेता और राज्यसभा सांसद जयराम रमेश ने आवाज उठाई है कि भारत सरकार को अपनी अंतरात्मा की आवाज सुननी चाहिए और लद्दाख के लोगों की जायज मांगों को सिर्फ बातचीत तक सीमित न रखकर, उन्हें पूरी तरह से पूरा करना चाहिए।
रमेश ने चिंता व्यक्त की है कि लद्दाख के लोगों के भूमि और रोजगार के अधिकार खतरे में हैं। उनका कहना है कि स्थानीय प्रशासन नौकरशाही के चंगुल में है, और छठी अनुसूची के तहत विशेष सुरक्षा और निर्वाचित विधायिका जैसी उनकी महत्वपूर्ण मांगों को लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त, सीमा पर चीन की बढ़ती सक्रियता और सरकार की प्रतिक्रिया से उत्पन्न अनिश्चितता की छाया लद्दाख पर मंडरा रही है।
छह साल पहले, जब लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा मिला था, तब लोगों की उम्मीदें ऊँची थीं। लेकिन जयराम रमेश के अनुसार, भारी निराशा और मोहभंग ने उनकी जगह ले ली है। उनका आरोप है कि स्थानीय प्रशासन और निर्वाचित निकायों पर उपराज्यपाल और नौकरशाही का वर्चस्व स्थापित हो गया है। छठी अनुसूची के तहत संरक्षण और एक निर्वाचित विधायिका की उनकी न्यायसंगत मांगों पर अब तक केवल बैठकों का दौर ही चलता रहा है।
वास्तविक नियंत्रण रेखा पर यथास्थिति को चीन द्वारा एकतरफा भंग करना और प्रधानमंत्री द्वारा 19 जून, 2020 को चीन को क्लीन चिट दिए जाने के बाद से बड़ी अनिश्चितता छाई हुई है।
जयराम रमेश ने इस बात पर जोर दिया कि लद्दाख भारत के लिए बहुआयामी रूप से महत्वपूर्ण है, चाहे वह सांस्कृतिक, आर्थिक, पारिस्थितिक या सामरिक दृष्टि से हो। उन्होंने कहा कि लद्दाख के लोग हमेशा से गर्वित भारतीय रहे हैं। उनकी पीड़ा और व्यथा भारत सरकार की अंतरात्मा को जगाएगी, ताकि वे सिर्फ और अधिक बातचीत में न उलझें, बल्कि उनकी वैध आकांक्षाओं को शीघ्रताशीघ्र और पूर्ण रूप से पूरा करें।
गौरतलब है कि 24 सितंबर को लेह में हुई हिंसा के बाद, राज्य का दर्जा देने और छठी अनुसूची में शामिल करने की मांगों के बीच, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 163 के तहत प्रतिबंध अभी भी जारी हैं।
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