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युवराज मेहता की दुखद मौत के मामले में ग्रेटर नोएडा पुलिस ने अब सख्त रुख अपना लिया है। जांच के दौरान बिल्डर की भूमिका सामने आने के बाद पुलिस ने लोटस ग्रीन के बिल्डर निर्मल सिंह के खिलाफ गैर-जमानती वारंट (एनबीडब्ल्यू) जारी कर दिया है। इस कार्रवाई के बाद पुलिस टीमों को आरोपियों की धरपकड़ के लिए लगा दिया गया है। इससे पहले, इसी मामले में लोटस ग्रीन कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड और दो अन्य आरोपियों—रवि बंसल और सचिन करणवाल को गिरफ्तार किया जा चुका है।
एनडीआरएफ ने घटनास्थल का किया दौरा
इस बीच, आज सुबह राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (एनडीआरएफ) की टीम ने ग्रेटर नोएडा के सेक्टर 150 स्थित उस जगह का निरीक्षण किया जहाँ 27 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की कार पानी से भरे गड्ढे में डूबने से 16-17 जनवरी की रात मौत हो गई थी। निरीक्षण ऐसे समय में हुआ है जब राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) ने भी इस मामले का स्वतः संज्ञान लिया है। एनजीटी ने कथित पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन और प्रशासनिक निष्क्रियता के लिए कई राज्य व स्थानीय अधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
बिना बैरिकेड और जहरीले पानी से भरा था गड्ढा
मामले की एफआईआर में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। जिस गड्ढे में युवराज की कार गिरी, वह गहरा था और बिना बैरिकेड के था। यह गड्ढा कचरे से मिश्रित अत्यधिक प्रदूषित पानी से भरा हुआ था, जिसमें से तेज दुर्गंध आ रही थी। सार्वजनिक सड़क के करीब स्थित होने के बावजूद इस पर कोई चेतावनी संकेत या सुरक्षा उपाय नहीं थे, जिससे यह जानलेवा बन गया था।
मृतक के परिवार द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत के आधार पर पुलिस ने पांच आरोपियों—अभय कुमार, संजय कुमार, मनीष कुमार, अचल बोहरा और निर्मल कुमार (निर्मल सिंह) के खिलाफ पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986, जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 और भारतीय दंड संहिता की संबंधित धाराओं के तहत केस दर्ज किया था।
संपत्ति का विवादास्पद इतिहास
मामले की पृष्ठभूमि में जमीन का विवाद भी है। यह जमीन लोटस ग्रीन कंस्ट्रक्शन ने 2014 में खरीदी थी और बाद में 2020 में विज़टाउन को बेच दी गई, हालांकि कंपनी अभी भी उसमें एक महत्वपूर्ण हिस्सेदारी रखती है। पुलिस और प्रशासन अब यह जांच कर रहे हैं कि इतने जोखिम भरे निर्माण की अनुमति कैसे दी गई और इसे बंद क्यों नहीं किया गया।
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