उज्जैन में युवा धर्म संसद-2026 को संबोधित करते हुए RSS प्रमुख मोहन भागवत ने धर्म और रिलीजन के बीच अंतर समझाया। उन्होंने कहा कि धर्म केवल किसी पंथ या पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं है, बल्कि अस्तित्व, आचरण और जीवन के सिद्धांतों से जुड़ा है।
उज्जैन में युवा धर्म संसद को संबोधित किया
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने शुक्रवार को उज्जैन में आयोजित तीन दिवसीय ‘युवा धर्म संसद-2026’ को संबोधित किया। कार्यक्रम में देश के कई राज्यों से युवा, विद्यार्थी, शिक्षक और धर्माचार्य शामिल हुए। रिपोर्टों के अनुसार, आयोजन में 24 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से 1,600 से अधिक प्रतिभागी पहुंचे हैं।
भागवत ने युवाओं के बीच धर्म को लेकर चर्चा को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि आमतौर पर धर्म को रिलीजन के समान समझ लिया जाता है, जबकि दोनों अवधारणाओं में अंतर है।
‘रिलीजन धर्म नहीं, धर्म रिलीजन से ऊपर’
भागवत ने कहा कि ‘रिलीजन धर्म नहीं है, धर्म रिलीजन के ऊपर है।’ उनके अनुसार, रिलीजन किसी विशेष मत, पंथ या धार्मिक परंपरा से संबंधित हो सकता है, जबकि धर्म का अर्थ इससे व्यापक है। उन्होंने धर्म को व्यक्ति और सृष्टि के अस्तित्व से जुड़ा हुआ बताया।
उन्होंने कहा कि धर्म को केवल बुजुर्गों या जीवन के अंतिम चरण से जोड़कर नहीं देखना चाहिए। उनके मुताबिक धर्म व्यक्ति के जीवन की शुरुआत से अंत तक बना रहता है और जीवन को दिशा देने वाला सिद्धांत है।
‘धर्म बांधता नहीं, मुक्त करता है’
संघ प्रमुख ने अपने संबोधन में धर्म और रिलीजन की व्याख्या करते हुए कहा कि रिलीजन को किसी अनुशासन या व्यवस्था से जोड़ा जा सकता है, जबकि धर्म मनुष्य को मुक्त करने वाला है।
उन्होंने युवाओं से धर्म को समझने के लिए पहले से बनी धारणाओं और पूर्वाग्रहों से बाहर निकलने की बात कही। उनके अनुसार, धर्म केवल किसी विशेष धार्मिक पहचान का नाम नहीं है, बल्कि जीवन के आचरण और कर्तव्य से भी संबंधित है।
‘रिलीजन’ शब्द को लेकर भी रखी बात
भागवत ने ‘रिलीजन’ शब्द की व्युत्पत्ति का उल्लेख करते हुए कहा कि यह ‘रिलीगो’ से आया है और इसे बांधने या अनुशासन में रखने के अर्थ से जोड़ा। इसके विपरीत उन्होंने धर्म को ऐसा सिद्धांत बताया जो व्यक्ति को जीवन के व्यापक सत्य और कर्तव्य से जोड़ता है।
उन्होंने यह भी कहा कि जब धार्मिक परंपराएं धर्म के मूल सिद्धांतों से अलग हो जाती हैं तो सांप्रदायिक संघर्ष और धर्म के नाम पर अत्याचार जैसी स्थितियां पैदा हो सकती हैं।
युवाओं से धर्म को जीवन से जोड़ने की अपील
मोहन भागवत ने कहा कि धर्म को केवल धार्मिक ग्रंथ पढ़ने या पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने युवाओं के बीच धर्म, संस्कृति और जीवन मूल्यों पर संवाद की जरूरत पर जोर दिया।
उज्जैन में आयोजित यह युवा धर्म संसद 17 से 19 सितंबर तक चल रही है, जिसमें धर्म, समाज, संस्कृति और बदलते भारत से जुड़े विषयों पर युवाओं के बीच चर्चा हो रही है।
धर्म और रिलीजन पर भागवत के बयान की चर्चा
भागवत का यह संबोधन ऐसे समय आया है जब धर्म, संस्कृति और भारतीय परंपरा को लेकर सार्वजनिक विमर्श लगातार चर्चा में रहता है। उनके बयान में मुख्य जोर इस बात पर रहा कि भारतीय संदर्भ में ‘धर्म’ को केवल अंग्रेजी शब्द ‘religion’ के समानार्थी के रूप में नहीं समझा जाना चाहिए।
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