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ट्रंप का ‘शांति बोर्ड’ निमंत्रण: कूटनीतिक सम्मान या रणनीतिक चाल?
लेखक: दिव्यांश रस्तोगी
प्रकाशित: सोमवार, 19 जनवरी 2026, 21:44 [IST]
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा गाजा में शांति स्थापना के लिए गठित ‘बोर्ड ऑफ पीस’ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आमंत्रित किया जाना, पहली नज़र में भारत की वैश्विक कूटनीति प्रतिष्ठा की स्वीकृति प्रतीत होता है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति की परतें इतनी सरल नहीं होतीं। यह निमंत्रण ऐसे समय आया है, जब भारत-अमेरिका संबंधों में सहयोग के साथ-साथ तनाव भी स्पष्ट रूप से मौजूद है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है: क्या यह भारत की कूटनीतिक ताकत की जीत है या फिर वाशिंगटन की एक सोची-समझी चाल?
पिछले एक साल की घटनाओं पर नज़र डालें तो तस्वीर और साफ होती है। 2025 में कश्मीर के पहलगाम में पाक-पोषित आतंकवादियों द्वारा 26 पर्यटकों की निर्मम हत्या के बाद भारत ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के तहत निर्णायक सैन्य कार्रवाई की। इस दौरान ट्रंप बार-बार खुद को भारत-पाक युद्ध विराम का सूत्रधार बताते रहे, जबकि नई दिल्ली ने साफ शब्दों में किसी भी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता से इनकार किया। ट्रंप के ये दावे न सिर्फ तथ्यात्मक रूप से कमजोर थे, बल्कि भारत की संप्रभुता पर सवाल खड़े करने वाले भी।
इसी समय अमेरिका ने पाकिस्तान को F-16 विमानों के रखरखाव के लिए 686 मिलियन डॉलर की सैन्य सहायता दी। यह एक ऐसा कदम था जो दक्षिण एशिया के सामरिक संतुलन को बिगाड़ सकता है। यह वही पाकिस्तान है, जिसकी धरती से भारत के खिलाफ आतंकवाद को संरक्षण मिलता रहा है। यहाँ तक कि पाकिस्तान पर 26/11 हमले का सूत्रधार ओसामा बिन लादेन इसी पाकिस्तान में उसके सैन्य प्रसाधन के साए में छुपा बैठा था जिसे अमेरिका ने पाकिस्तान में ही घुसकर मारा। बहरहाल, ट्रंप के दूसरे शासनकाल में वाशिंगटन का दोहरा रवैया भारत के लिए नई बात नहीं है।
आर्थिक मोर्चे पर भी दबाव की राजनीति दिखी। अलग-अलग बहाने से भारतीय उत्पादों पर 50 प्रतिशत तक टैरिफ लगाए गए, रूस से तेल खरीद को लेकर नैतिक उपदेश दिए गए। लेकिन नई दिल्ली ने न तो घबराहट दिखाई, न ही जल्दबाज़ी। दिसंबर 2025 में भी भारत ने रूस से प्रतिदिन 11.46 लाख बैरल तेल आयात किया। भारी विदेश मंत्री हर मंच पर पूरी स्पष्टता के साथ बोलते रहे कि भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा पर किसी भी तरह का समझौता नहीं करेगा। भारत का यह संयमित मौन, दरअसल अमेरिका के आक्रामक रवैये का सबसे सटीक जवाब रहा।
इस बीच ट्रंप की विदेश नीति का बड़ा पैटर्न भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। वेनेजुएला से लेकर ग्रीनलैंड तक, ‘अमेरिका फर्स्ट’ की सोच ने अप्रत्यक्ष उपनिवेशवाद को बढ़ावा दिया है, जिसने बहुपक्षीय वैश्विक व्यवस्था को कमजोर किया है। यही पृष्ठभूमि गाजा शांति बोर्ड के निमंत्रण को और संदिग्ध बनाती है।
इसके उलट, भारत की कूटनीति संतुलन और जिम्मेदारी का उदाहरण रही है। इजरायल के साथ मजबूत रक्षा संबंधों के बावजूद भारत ने गाजा के लिए मानवीय सहायता भेजी, संयुक्त राष्ट्र में हिंसा की निंदा की और फिलिस्तीन के पक्ष में अपनी पारंपरिक नीति बनाए रखी। रूस-यूक्रेन युद्ध में भी भारत संवाद का पुल बना रहा। यही भारत की गुटनिरपेक्ष विरासत की आधुनिक व्याख्या है।
ऐसे में गाजा शांति बोर्ड भारत के लिए अवसर भी है और चुनौती भी। यह मंच भारत को वैश्विक मध्यस्थ के रूप में स्थापित कर सकता है, बशर्ते वह अपनी रणनीतिक स्वायत्तता से कोई समझौता न करे। ट्रंप का निमंत्रण ‘गाजर’ की तरह लुभावना हो सकता है, लेकिन भारत को इसे अपनी शर्तों पर, अपने हितों के साथ स्वीकार करना होगा। कूटनीति में जीत शोर से नहीं, संतुलन से मिलती है। और फिलहाल, यही भारत की सबसे बड़ी ताकत है।
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