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-Oneindia Staff
अंतिम अपडेट: मंगलवार, 23 दिसंबर, 2025, 2:31 [IST]
भारत और यूनाइटेड किंगडम के बीच का ऐतिहासिक रिश्ता स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में भी उतना ही गहरा रहा है। लेकिन आज की तस्वीर बदल रही है। यूके की हालिया नीतियों ने भारतीय चिकित्सा पेशेवरों को एक बड़े असमंजस में डाल दिया है। नेशनल हेल्थ सर्विस (NHS) में सेवाएं दे रहे भारतीय मूल के वरिष्ठ डॉक्टरों का मानना है कि बढ़ते वित्तीय दबाव और कड़े आप्रवासन नियमों के कारण अब कई भारतीय डॉक्टर ब्रिटेन छोड़ने का मन बना रहे हैं।
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संसद के शीतकालीन सत्र में पेश किए गए सरकारी आंकड़े एक चौंकाने वाली हकीकत बयां करते हैं। भारतीय नागरिकों को जारी किए गए ‘स्वास्थ्य और देखभाल कार्यकर्ता’ वीज़ा में करीब 67 प्रतिशत की भारी कमी आई है। नर्सिंग पेशेवरों के मामले में तो यह गिरावट और भी अधिक यानी 79 प्रतिशत तक पहुंच गई है। एनएचएस के वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. राजय नारायण का कहना है कि अब ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे देश बेहतर वेतन और करियर के स्पष्ट मार्ग की वजह से डॉक्टरों की पहली पसंद बनते जा रहे हैं।
डॉ. नारायण के अनुसार, यूरोपीय देशों की तुलना में कम वेतन मिलना एक बड़ी चुनौती है, जिसके कारण युवा स्नातक यूके का रुख नहीं कर रहे। भारतीय मूल के स्वास्थ्य सेवा पेशेवर अब बेहतर जीवन स्तर और विदेशों में कम करों (Tax) के प्रति अधिक आकर्षित हो रहे हैं। कभी दुनिया की सबसे अग्रणी स्वास्थ्य प्रणालियों में शुमार एनएचएस आज लंबे इंतजार की सूची जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रही है।
एनएचएस की शुरुआत 1948 में दूसरे विश्व युद्ध के बाद एक बड़े सामाजिक सुधार के रूप में हुई थी, जिसमें भारतीय डॉक्टरों का योगदान हमेशा से महत्वपूर्ण रहा है। हालांकि, ब्रिटेन की मौजूदा सरकारें शुद्ध प्रवासन (Net Migration) को कम करने की नीति पर काम कर रही हैं, जिसका सीधा असर एनएचएस में काम करने की इच्छा रखने वाले कानूनी प्रवासियों पर पड़ा है।
रेडियोलॉजिस्ट संजय गांधी बताते हैं कि अवैध आप्रवासन पर नियंत्रण पाने की कोशिशों के बीच कानूनी प्रवासियों को भी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। इसके अलावा, ब्रिटेन के स्थानीय प्रशिक्षित डॉक्टरों से बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने भी चुनौतियों को बढ़ा दिया है। मेडिकल स्नातकों की संख्या तो बढ़ी है, लेकिन प्रशिक्षण के पदों में उस अनुपात में वृद्धि नहीं हुई, जिससे योग्य डॉक्टरों के लिए भी नौकरी पाना एक संघर्ष बन गया है।
प्रोफेसर गांधी का कहना है कि जनरल मेडिकल काउंसिल (GMC) को PLAB परीक्षाओं को सीमित करने के निर्देश दिए गए हैं। ये परीक्षाएं न केवल महंगी हैं, बल्कि इन्हें पास करने के बाद भी नौकरी की सुरक्षा बेहद कम रह गई है। अंतरराष्ट्रीय मेडिकल स्नातकों के लिए ये परीक्षाएं यूके में काम करने का एकमात्र जरिया थीं, जो अब काफी कठिन हो गया है।
2024 के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, एनएचएस कार्यबल में 13 प्रतिशत हिस्सा एशियाई या ब्रिटिश एशियाई कर्मचारियों का है। प्रो. गांधी को अंदेशा है कि यह संख्या भविष्य में काफी कम हो सकती है, क्योंकि भारतीय डॉक्टरों की नई खेप अब ऑस्ट्रेलिया या न्यूजीलैंड जैसे देशों को प्राथमिकता दे रही है।
आर्थिक संकट और बढ़ता दबाव
यूके में बढ़ती महंगाई और कम वेतन भारतीय पेशेवरों के लिए सबसे बड़ी चिंता है। एक वरिष्ठ एनएचएस सलाहकार को 45 प्रतिशत तक का उच्च आयकर (Income Tax) चुकाना पड़ता है, जिसके साथ नेशनल इंश्योरेंस और पेंशन योजनाओं का अतिरिक्त खर्च जुड़ा होता है।
पल्मोनोलॉजिस्ट मनीष गौतम का कहना है कि नए डॉक्टरों के लिए अब पद हासिल करना बेहद चुनौतीपूर्ण हो गया है। रेजिडेंट डॉक्टर के एक पद के लिए सैकड़ों आवेदन आ रहे हैं, जिससे खुद यूके के स्नातकों के लिए भी अवसर सीमित हो गए हैं।
कोविड-19 महामारी के बाद एनएचएस पर वित्तीय बोझ और बढ़ गया है। स्टाफ की कमी को पूरा करने के लिए एजेंसी स्टाफ पर भारी खर्च किया जा रहा है। मनीष गौतम के अनुसार, एनएचएस ट्रस्ट अब बचत करने और कार्यबल की उत्पादकता बढ़ाने के भारी दबाव में हैं।
निष्कर्षतः, भले ही ब्रिटेन की स्वास्थ्य सेवा का अनुभव आज भी मूल्यवान माना जाता है, लेकिन बदलती वित्तीय हकीकत ने इसके आकर्षण को कम कर दिया है। एक स्थायी कार्यबल बनाने की प्रक्रिया में लगने वाला समय वर्तमान और भविष्य के स्वास्थ्य सेवा पेशेवरों, दोनों को प्रभावित कर रहा है।
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