संविधान बनाम मनुस्मृति: एक नई बहस का जन्म
क्या भारत का संविधान, जो 26 नवंबर, 1949 को अंगीकार किया गया था, अपनी जड़ों से भटक गया है? यह सवाल आज फिर से चर्चा में है, और इसकी शुरुआत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के एक बयान से हुई है। पीटीआई-भाषा से बातचीत में, एक सूत्र ने दावा किया कि आरएसएस, देश के उच्चतम कानून के निर्माण के समय से ही, संविधान के प्रति अपनी असहमति जताता रहा है। उनके अनुसार, इस असहमति का मुख्य कारण यह है कि संविधान, मनुस्मृति के प्राचीन और गौरवशाली मूल्यों को अपने अंदर समाहित नहीं करता।
यह मुद्दा तब और गंभीर हो जाता है जब वर्तमान सरकार के एक मसौदे का जिक्र किया जाता है। सूत्र के अनुसार, मोदी सरकार के इस मसौदे में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि श्रम शक्ति नीति, भारतीय संविधान से प्रेरणा लेने के बजाय, मनुस्मृति जैसे प्राचीन ग्रंथों से प्रेरित है। इस कदम को संविधान का सीधा अपमान माना जा रहा है, और इसकी कड़ी निंदा की मांग उठाई जा रही है।
यह बयान एक महत्वपूर्ण बहस को जन्म देता है: क्या भारत के प्राचीन ग्रंथ, जो हजारों वर्षों से समाज का मार्गदर्शन करते आए हैं, वर्तमान समय में भी प्रासंगिक हैं? और यदि हाँ, तो क्या उन्हें आधुनिक कानूनों और नीतियों का आधार बनाया जाना चाहिए? यह सवाल सिर्फ़ एक राजनीतिक बयान नहीं है, बल्कि यह देश की पहचान, उसके भविष्य की दिशा, और उसके संवैधानिक मूल्यों के भविष्य पर एक गहरी छाप छोड़ता है। यह निश्चित रूप से एक ऐसा मुद्दा है जिस पर विचार-विमर्श जारी रहेगा।
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