वर्ष 2025 का अंतिम सूर्य ग्रहण: गर्भवती महिलाओं के लिए विशेष सावधानियां और मान्यताएं
नई दिल्ली: साल 2025 का आखिरी सूर्य ग्रहण 21 सितंबर, रविवार की रात 10:39 बजे से शुरू होकर 22 सितंबर की सुबह 3:29 बजे तक रहेगा। हालांकि, यह ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा, इसलिए इसका सूतक काल मान्य नहीं होगा। बावजूद इसके, वैदिक ज्योतिष के अनुसार ग्रहण के दौरान राशियों में होने वाले परिवर्तन का प्रभाव जनजीवन पर पड़ना स्वाभाविक है। ऐसे में, कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक हो जाता है।
गर्भवती महिलाएं और ग्रहण का भय:
ग्रहण को लेकर गर्भवती महिलाएं अक्सर सबसे अधिक चिंतित रहती हैं। ऐसी मान्यता है कि ग्रहण काल में गर्भस्थ शिशु को खतरा हो सकता है, इसी कारण बुजुर्ग भी ग्रहण के दौरान गर्भवती महिलाओं को घर से बाहर निकलने से रोकते हैं। कहा जाता है कि यदि गर्भवती महिलाएं ग्रहण के दौरान चाकू-कैंची जैसी नुकीली वस्तुओं का प्रयोग करें, तो जन्म लेने वाले बच्चे के कान और नाक कटे रह सकते हैं। हालांकि, आज तक ऐसे किसी मामले की पुष्टि नहीं हुई है। आइए, विस्तार से जानते हैं कि सूर्य ग्रहण के दौरान गर्भवती स्त्रियों को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए और क्या करना चाहिए व क्या नहीं।
गर्भवती महिलाओं को ग्रहण काल में क्या करना चाहिए?
- घर पर ही रहें: सूर्य ग्रहण की अवधि में घर से बाहर न निकलें। माना जाता है कि ग्रहण काल में नकारात्मक ऊर्जा अधिक सक्रिय हो जाती है, जिसका सीधा असर गर्भस्थ शिशु पर पड़ सकता है।
- मंत्र जाप: ‘ॐ नमः शिवाय’ या ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ जैसे मंत्रों का जाप करें। इससे शिशु का मानसिक स्वास्थ्य बेहतर रहता है।
- भोजन-जल को शुद्ध रखें: अपने भोजन और पानी में तुलसी का पत्ता डालकर रखें, इससे वे ग्रहण काल में भी खराब नहीं होते। यद्यपि ग्रहणकाल में खाने-पीने की मनाही होती है, लेकिन गर्भवती महिलाएं अधिक समय तक भूखी नहीं रह सकतीं, इसलिए उन्हें हल्का-फुल्का भोजन कर लेना चाहिए।
- सकारात्मक माहौल: सकारात्मक माहौल बनाए रखने के लिए धार्मिक ग्रंथ पढ़ें या भजन सुनें। थकाने वाले काम या नुकीली वस्तुओं के प्रयोग से बचें।
- ग्रहण को सीधे न देखें: तेज रोशनी या ग्रहण की छाया को सीधे देखने से बचें। ग्रहण समाप्त होने के बाद स्नान कर साफ-सुथरे कपड़े पहनें।
- ईश्वर का स्मरण: ग्रहणकाल में गणेश जी और कान्हा जी का स्मरण करें, इससे मानसिक शांति बनी रहती है।
गणेश मंत्र:
- ऊँ वक्रतुण्ड महाकाय सूर्य कोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरू मे देव, सर्व कार्येषु सर्वदा॥
- ऊँ एकदन्ताय विहे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दन्तिः प्रचोदयात्॥
- ऊँ गं गणपतये नमो नमः
- ॐ गं गणपतये नमः
- “ॐ वक्रतुंडाय हुम्”
- ॐ श्रीं गं सौभ्याय गणपतये वर वरद सर्वजनं में वशमानय स्वाहा।
- ॐ वक्रतुण्डैक दंष्ट्राय क्लीं ह्रीं श्रीं गं गणपते वर वरद सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा।
अस्वीकरण: इस लेख का उद्देश्य किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा देना नहीं है। यह जानकारी इंटरनेट पर उपलब्ध मान्यताओं और सूचनाओं पर आधारित है। OneIndia लेख से संबंधित किसी भी जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। इसलिए, किसी भी जानकारी को अमल में लाने से पहले कृपया किसी जानकार ज्योतिषी या पंडित की सलाह अवश्य लें।
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