काशी—वह अविनाशी नगरी जिसे साक्षात ‘मोक्ष की देहरी’ कहा जाता है। मान्यता है कि यदि जीवनकाल में एक बार भी इस पावन नगरी की रज माथे पर लग जाए, तो जातक जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है। परंतु, काशी का यह मोक्ष इतना सुलभ भी नहीं है। स्कंद पुराण के ‘काशी खंड’ का प्रथम श्लोक उद्घोष करता है— ‘विश्वेशं माधवं धुण्डिं दण्डपाणिं च भैरवम्। वन्दे काशीं गुहां गङ्गां भवानीं मणिकर्णिकाम॥’ इसका आध्यात्मिक सार यही है कि केवल बाबा विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग की देहरी चूम लेने भर से आपकी काशी यात्रा पूर्ण नहीं होती। हिंदू धर्म के इस सबसे पवित्र धाम का पूर्ण फल तभी प्राप्त होता है, जब आप महादेव के साथ-साथ यहाँ विराजमान अन्य विशिष्ट शक्तियों के भी शरणागत होते हैं।
जानिए उन मंदिरों के बारे में, जिनके बिना अधूरी है आपकी यात्रा:
काल भैरव मंदिर: काशी के कोतवाल
काशी में प्रवेश करते ही सबसे पहले ‘कोतवाल’ काल भैरव के दरबार में हाजिरी लगाना अनिवार्य है। धार्मिक मान्यता है कि बिना काल भैरव की अनुमति के बाबा विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग के दर्शन का फल प्राप्त नहीं होता। काशी के रक्षक के रूप में पहले उनकी आज्ञा लेना ही इस यात्रा का प्रथम नियम है।
माता अन्नपूर्णा मंदिर: ममता और पोषण की देवी
ज्योतिर्लिंग के दर्शन के पश्चात मां अन्नपूर्णा की शरण में जाना आवश्यक है। वे काशी की अन्नदात्री हैं। पुराणों में उल्लेख मिलता है कि जो भी श्रद्धालु यहाँ आकर मां के सम्मुख झुकता है, उसे जीवन में कभी भी अभाव और अन्न की कमी का सामना नहीं करना पड़ता।
धुंडीराज विनायक मंदिर: प्रथम पूज्य की उपस्थिति
काशी विश्वनाथ मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार पर ही भगवान गणेश का प्राचीन ‘धुंडीराज’ रूप विराजमान है। इनके वंदन के बिना ज्योतिर्लिंग के दर्शन अधूरे माने जाते हैं। धुंडीराज के आशीष के बाद ही भक्त भगवान शिव के दर्शन के पात्र बनते हैं।
बिंदु माधव मंदिर: जहाँ विष्णु और शिव एकाकार हैं
वाराणसी के प्रसिद्ध पंचगंगा घाट पर स्थित बिंदु माधव मंदिर में साक्षात श्रीहरि विष्णु विराजमान हैं। मान्यता है कि यह वही अलौकिक स्थान है, जहाँ भगवान विष्णु ने महादेव की कठोर तपस्या की थी। इनके दर्शन किए बिना काशी की आध्यात्मिक यात्रा को पूर्णता नहीं मिलती।
विशालाक्षी मंदिर: शक्ति की पावन आभा
51 शक्तिपीठों में से एक ‘विशालाक्षी मंदिर’ इस यात्रा का एक अपरिहार्य हिस्सा है। मणिकर्णिका घाट के समीप स्थित इस मंदिर में मां सती के दाहिने कान का कुंडल गिरा था। यहाँ देवी की उपस्थिति काशी की ऊर्जा को पूर्ण करती है, इसलिए उनके दर्शन अत्यंत फलदायी हैं।
दंडपाणि मंदिर: काशी के न्यायधीश
काशी के सबसे प्राचीन और रहस्यमयी मंदिरों में से एक दंडपाणि मंदिर है। यहाँ हरिकेश देव की पूजा होती है, जिन्हें काशी का न्यायधीश कहा जाता है। वे हाथ में छड़ी (दंड) लिए हुए हैं और कहा जाता है कि वे किसी भी अधर्मी या गलत व्यक्ति को इस पवित्र नगरी में टिकने नहीं देते।
अतः, यदि आप मोक्षदायिनी काशी की यात्रा पर निकल रहे हैं, तो इन दिव्य चौखटों पर माथा टेकना न भूलें। इन प्राचीन मंदिरों के दर्शन के बाद ही आपकी काशी यात्रा वास्तव में सफल और सार्थक मानी जाएगी।
Discover more from Aware Media News - Hindi News, Breaking News & Latest Updates
Subscribe to get the latest posts sent to your email.


