राजस्थान के सबसे चर्चित आपराधिक मामलों में शामिल डांगावास हत्याकांड में 11 साल बाद अदालत का फैसला आया है। SC/ST स्पेशल कोर्ट ने सबूतों के अभाव में सभी 40 आरोपियों को बरी कर दिया। फैसले के बाद जहां एक पक्ष ने राहत जताई, वहीं पीड़ित परिवार ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती देने का ऐलान किया है।
11 साल बाद आया बहुप्रतीक्षित फैसला
वर्ष 2015 में नागौर जिले के डांगावास गांव में हुए बहुचर्चित हत्याकांड मामले में बुधवार को मेड़ता स्थित SC/ST स्पेशल कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया। अदालत ने करीब 11 साल तक चली सुनवाई के बाद सभी 40 आरोपियों को बरी कर दिया। इस निर्णय के बाद पूरे नागौर जिले और आसपास के इलाकों में मामले को लेकर व्यापक चर्चा शुरू हो गई।
23 बीघा जमीन के विवाद से भड़की थी हिंसा
14 मई 2015 को 23 बीघा जमीन को लेकर दो पक्षों के बीच विवाद हिंसक झड़प में बदल गया था। इस घटना में रतनराम मेघवाल, पोखरराम मेघवाल, पांचाराम मेघवाल, खेमाराम मेघवाल और गणपतराम मेघवाल सहित पांच लोगों की मौत हुई थी। दूसरे पक्ष के रामपाल गोसाईं की भी गोली लगने से जान चली गई थी। मामले में यह भी आरोप था कि तीन लोगों को ट्रैक्टर से कुचल दिया गया था, जिसके बाद पूरे प्रदेश में इस घटना को लेकर भारी आक्रोश देखने को मिला।
कोर्ट ने क्यों किया सभी आरोपियों को बरी?
सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने 82 गवाह पेश किए, जबकि शिकायतकर्ता की ओर से 8 अतिरिक्त गवाहों को अदालत में प्रस्तुत किया गया। अदालत ने पाया कि अधिकांश गवाह आरोपियों की स्पष्ट पहचान नहीं कर सके। न्यायालय ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा। बचाव पक्ष के वकीलों के अनुसार, अदालत ने यह भी माना कि जांच के दौरान कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर पर्याप्त स्पष्टता नहीं थी और उपलब्ध साक्ष्य दोष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं थे।
दोनों पक्षों की अलग-अलग प्रतिक्रिया
फैसले के बाद बचाव पक्ष के अधिवक्ताओं ने इसे न्याय की जीत बताते हुए अदालत के निर्णय का स्वागत किया। वहीं डांगावास गांव में कई लोगों ने फैसले पर खुशी जाहिर की। दूसरी ओर पीड़ित पक्ष के प्रतिनिधि गोविंद मेघवाल ने सवाल उठाया कि यदि सभी आरोपी बरी हो गए, तो उनके परिजनों की हत्या किसने की। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस फैसले को राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी जाएगी।
अब आगे क्या होगा?
स्थानीय अदालत के फैसले के बाद अब इस मामले की अगली कानूनी लड़ाई हाईकोर्ट में देखने को मिल सकती है। यदि पीड़ित पक्ष अपील दायर करता है, तो उच्च न्यायालय उपलब्ध साक्ष्यों और निचली अदालत के फैसले की दोबारा समीक्षा करेगा। ऐसे में वर्षों से चर्चा में रहे इस मामले की कानूनी प्रक्रिया अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।
निष्कर्ष
डांगावास हत्याकांड का फैसला भारतीय न्याय व्यवस्था में साक्ष्यों के महत्व को एक बार फिर रेखांकित करता है। अदालत ने उपलब्ध सबूतों के आधार पर अपना निर्णय दिया है, जबकि पीड़ित पक्ष न्याय की अगली लड़ाई हाईकोर्ट में लड़ने की तैयारी कर रहा है। अब सभी की नजर इस बात पर रहेगी कि इस बहुचर्चित मामले में आगे क्या कानूनी मोड़ आता है।
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