शक्ति का उद्गम, कामनाओं का धाम: कामाख्या मंदिर का रहस्यमय आवरण
नई दिल्ली: पूरे देश में नवरात्रि का पावन पर्व श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। देवी दुर्गा, आदि शक्ति के नौ स्वरूपों की आराधना का यह अवसर बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। इसी विशेष कालखंड में, जहां भक्त देवी के विभिन्न रूपों की पूजा-अर्चना करते हैं, वहीं शक्ति पीठों का महत्व और भी बढ़ जाता है। भारत में स्थित 51 शक्ति पीठों में से असम के गुवाहाटी में स्थित कामाख्या मंदिर का स्थान विशेष है। यह मंदिर न केवल अपनी अनूठी पूजा पद्धति के लिए जाना जाता है, बल्कि तंत्र सिद्धि चाहने वालों के लिए यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्थल है, जिसके साथ अनेक रहस्य और कथाएं जुड़ी हुई हैं।
कामाख्या मंदिर: इतिहास के पन्नों और पौराणिक गाथाओं का संगम
पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी सती के देह त्याग के पश्चात, भगवान शिव उनके पार्थिव शरीर को लेकर ब्रह्मांड में व्याकुल विचरण कर रहे थे। तब भगवान विष्णु ने, शिव के मोह को भंग करने के उद्देश्य से, अपने सुदर्शन चक्र से देवी के शरीर को 51 खंडों में विभाजित कर दिया। जहां-जहां देवी के अंग गिरे, वे स्थान शक्ति पीठ कहलाए। असम की नीलाचल पहाड़ी पर देवी कामाख्या का विश्व प्रसिद्ध मंदिर स्थित है, जहां देवी का योनि अंग गिरा था। इस अद्भुत मंदिर का निर्माण और इससे जुड़े रहस्य, इसे अन्य शक्ति पीठों से अलग बनाते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस मंदिर की सर्वप्रथम स्थापना कामदेव ने भगवान विश्वकर्मा की सहायता से की थी। हालांकि, किंवदंतियों के अनुसार, मूल मंदिर वर्तमान स्वरूप से कहीं अधिक विशाल था, जिसकी वास्तुकला और मूर्तिकला आश्चर्यजनक थी। समय के साथ, मंदिर का ऊपरी हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया।
ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखें तो, कामाख्या मंदिर को ब्रह्मपुत्र घाटी के प्रारंभिक शासक नरक के काल में विशेष ख्याति मिली। हालांकि, उनके उत्तराधिकारियों के इतिहास से यह स्पष्ट नहीं होता कि उन्होंने मंदिर के संरक्षण में भूमिका निभाई या नहीं। इसके अतिरिक्त, इस मंदिर के मूल निर्माण का श्रेय किसे जाता है, इस पर भी ऐतिहासिक साक्ष्य अनिश्चित हैं। वर्तमान कामाख्या मंदिर का पुनर्निर्माण 1565 ईस्वी में, 11वीं-12वीं शताब्दी के एक पाषाण मंदिर के अवशेषों पर किया गया था। इसकी वास्तुकला उत्तर भारतीय नागर शैली और अरब/मुगल शैलियों का एक अनूठा संगम प्रस्तुत करती है।
कामदेव की तपस्या और कामाख्या का उद्भव
जब देवी सती ने अपने प्राण त्याग दिए, तब भगवान शिव गहन समाधि में लीन हो गए। इस दौरान तारकासुर नामक दैत्य का आतंक चरम पर था। देवताओं को यह ज्ञात हुआ कि केवल भगवान शिव का पुत्र ही तारकासुर का वध कर सकता है। तब देवताओं के आग्रह पर, कामदेव ने भगवान शिव की समाधि पर अपना प्रेम-बाण चलाया। जब शिव की समाधि भंग हुई, तो वे अत्यंत क्रोधित हुए। उन्होंने अपनी तीसरी आंख खोली और क्रोधवश कामदेव को भस्म कर दिया।
अपने पति के भस्म हो जाने से व्यथित, कामदेव की पत्नी रति ने भगवान शिव से अत्यंत करुणापूर्ण निवेदन किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस कृत्य में कामदेव का कोई दोष नहीं था, बल्कि वे देवताओं के कहने पर ऐसा करने को विवश हुए थे। रति की याचना सुनकर, भगवान शिव ने कामदेव को जीवनदान तो दे दिया, परंतु उनका सुंदर, मोहक शरीर नष्ट हो चुका था। रति और कामदेव ने तब भगवान शिव से उनके पूर्व स्वरूप को पुनः प्राप्त करने की गुहार लगाई। इस पर, भगवान शिव ने उन्हें सलाह दी कि यदि वे नीलाचल पर्वत पर देवी की पवित्र योनि मुद्रा को खोजें और वहां देवी की आराधना करें, तभी वे अपना सौंदर्य पुनः प्राप्त कर पाएंगे।
कई वर्षों की कठिन साधना के पश्चात, कामदेव सफल हुए। देवी की कृपा से उन्हें उनका सुंदर शरीर पुनः प्राप्त हो गया। अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हुए, कामदेव ने विश्वकर्मा की सहायता से, देवी की योनि मुद्रा के ऊपर एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाया। इसी कारण, इस क्षेत्र को ‘कामरूप’ के नाम से भी जाना जाने लगा, क्योंकि यहीं कामदेव ने अपना सौंदर्य पुनः प्राप्त किया था।
भगवान शिव और देवी पार्वती का मिलन स्थली
शाक्त संप्रदाय के अत्यंत पवित्र ग्रंथ, ‘कालिका पुराण’ के अनुसार, प्राचीन कामरूप में नीलाचल नामक स्थान का उल्लेख मिलता है, जहां भगवान शिव और शक्ति अपनी भौतिक इच्छाओं, अर्थात ‘काम’, की पूर्ति करते थे। यही कारण है कि यहां किसी देवी की मूर्ति की पूजा नहीं की जाती, बल्कि योनि मुद्रा की पूजा होती है। यह स्थान सृष्टि की रचना और प्रजनन शक्ति का प्रतीक माना जाता है। ‘कालिका पुराण’ में कामाख्या मंदिर के बारे में विस्तृत विवरण मिलते हैं।
इसके अतिरिक्त, ‘योगिनी तंत्र’ नामक एक अन्य प्राचीन साहित्य, जिसका रचनाकाल लगभग 16वीं शताब्दी माना जाता है, उसमें भी देवी कामाख्या का उल्लेख है। ‘योगिनी तंत्र’ में भी प्रजनन के प्रतीक के रूप में कामाख्या के उद्भव से संबंधित कथाएं वर्णित हैं। मां कामाख्या, जिन्हें कामेश्वरी भी कहा जाता है, कामनाओं को पूर्ण करने वाली प्रसिद्ध देवी हैं। यहीं कारण है कि तंत्र विद्या के अभ्यासी तांत्रिक अपनी सिद्धियों की प्राप्ति हेतु यहां आते हैं।
नवरात्रि में तांत्रिक पूजा का विशेष महत्व
असम में कामाख्या मंदिर में शारदीय नवरात्रि को ‘दुर्गा पूजा’ के नाम से भी जाना जाता है, और यह उत्सव पूरे नौ दिनों तक चलता है। इस पावन अवसर पर, यहां विशेष तांत्रिक पूजा, अनुष्ठान और बलि पूजा का आयोजन होता है। इस दौरान, देवी के नौ स्वरूपों की आराधना की जाती है, साथ ही देवी के दस महाविद्या स्वरूपों की भी पूजा की जाती है। कामाख्या मंदिर परिसर में मां कामाख्या, दस महाविद्याओं और भगवान शिव के पांच मंदिर स्थित हैं।
कामाख्या की प्रसिद्धी का प्रतीक: अंबुबाची मेला
कामाख्या मंदिर के सबसे प्रतिष्ठित आयोजनों में से एक है ‘अंबुबाची मेला’। यह मेला आषाढ़ माह में आयोजित किया जाता है। इस मेले के दौरान, मंदिर के कपाट तीन दिनों के लिए बंद कर दिए जाते हैं और किसी भी भक्त को मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं होती। ऐसी मान्यता है कि इन तीन दिनों में देवी रजस्वला होती हैं, अर्थात उन्हें मासिक धर्म होता है। इन तीन दिनों के लिए, जब मंदिर के कपाट बंद होते हैं, योनि मुद्रा को एक सफेद वस्त्र से ढक दिया जाता है। चौथे दिन, जब मंदिर पुनः खुलता है, तो वह सफेद वस्त्र लाल रंग का हो चुका होता है और नम भी रहता है। इस वस्त्र के टुकड़े को प्रसाद स्वरूप भक्तों को वितरित किया जाता है।
एक और अद्भुत मान्यता यह है कि अंबुबाची मेले के दौरान, मंदिर के निकट बहने वाली ब्रह्मपुत्र नदी का जल भी लाल हो जाता है, जिसे मां के रजस्वला होने का प्रतीक माना जाता है। हालांकि वैज्ञानिक इस तर्क को स्वीकार नहीं करते, परंतु मां कामाख्या के प्रति अगाध श्रद्धा रखने वाले लोग इस घटना को सत्य मानते हैं।
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