सृष्टि की रचयिता, मां कुष्मांडा: अंधकार को चीरती मुस्कान की महागाथा
नवरात्रि का पावन अवसर, मां दुर्गा के नौ दिव्य स्वरूपों की आराधना का समय। हर रूप की अपनी गाथा, अपना अर्थ, और अपनी एक अनूठी पहचान। इन्हीं में से एक हैं मां कुष्मांडा, जिनकी पूजा नवरात्रि के चौथे दिन की जाती है। वह, जिन्होंने अंधकार से भरे ब्रह्मांड में अपनी मुस्कान से जीवन का प्रकाश बिखेरा, वही हैं सृष्टि की आदिम रचयिता।
मां कुष्मांडा का नाम, संस्कृत के तीन शब्दों का संगम है – ‘कू’ का अर्थ है ‘छोटा’, ‘उष्मा’ का अर्थ है ‘गर्मी’ और ‘अंडा’ का अर्थ है ‘दिव्य बीज’। यह नाम, उनके उस अलौकिक कार्य का प्रतीक है, जहाँ उन्होंने एक बीज से संपूर्ण ब्रह्मांड को जन्म दिया। मां दुर्गा की तरह ही, मां कुष्मांडा भी सिंह पर सवार होती हैं, और उनके तेज से सूर्य भी फीका पड़ जाए। आठ भुजाओं वाली यह देवी, शक्ति का साकार रूप हैं, जो अपनी असीम कृपा से भक्तों को शक्ति और समृद्धि प्रदान करती हैं।
अंधकार से प्रकाश तक: मां कुष्मांडा की अद्भुत कथा
शास्त्रों में मां कुष्मांडा का उल्लेख मिलता है, पर उनकी पूर्ण गाथा देवी पुराण में अंकित है। कथा के अनुसार, जब सृष्टि का आरम्भ हुआ था, तब सब कुछ गहन अंधकार और शून्यता में डूबा था। ऐसे निराकार ब्रह्मांड को देख, मां कुष्मांडा मात्र मुस्कुरा दीं। उनकी उस निर्मल, दिव्य मुस्कान से ही उस अंधकार भरे शून्य में प्रकाश का जन्म हुआ।
इसीलिए मां कुष्मांडा को शक्ति और प्रकाश का स्रोत माना जाता है। उनकी मुस्कान से उत्पन्न हुआ तेज, धीरे-धीरे पूरे ब्रह्मांड में फैल गया। इसी प्रकाश से सूर्य का उदय हुआ, और तत्पश्चात अन्य सभी ग्रहों का जन्म हुआ। सूर्य के आगमन से ही पृथ्वी पर जीवन का अंकुरण हुआ – पहले जल, फिर पेड़-पौधे, पशु-पक्षी और अंततः मानव जाति का विकास हुआ। यही कारण है कि मां कुष्मांडा को सृष्टि के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। कहीं-कहीं उनका वर्णन अष्ट भुजाओं के साथ तो कहीं दस भुजाओं के साथ भी मिलता है। मां कुष्मांडा ही इस सृष्टि का भरण-पोषण करती हैं, और यह माना जाता है कि उनकी ऊर्जा से ही यह संपूर्ण ब्रह्मांड संचालित होता है।
मां कुष्मांडा की आराधना
नवरात्रि के नौ दिनों में, मां कुष्मांडा की पूजा में मालपुए का विशेष भोग लगाया जाता है। साथ ही, सफेद कद्दू से बनी मिठाइयां भी उन्हें अत्यंत प्रिय हैं।
नवरात्रि के चौथे दिन, प्रात:काल स्नान आदि से निवृत्त होकर पीले वस्त्र धारण करें। मां कुष्मांडा को लाल फूल और पीले चंदन का अर्पण करें। भोग में मालपुआ चढ़ाने के उपरांत, उनकी आरती करें। मालपुए के साथ, आप अपनी सामर्थ्य अनुसार अन्य फल और मिठाइयाँ भी अर्पित कर सकते हैं। मां कुष्मांडा को पीला और हरा रंग विशेष प्रिय है।
कुष्मांडा माता के पावन धाम
मां कुष्मांडा का एक प्रसिद्ध मंदिर वाराणसी में सुशोभित है। इसके अतिरिक्त, कानपुर के घाटमपुर क्षेत्र में भी मां कुष्मांडा का एक प्रतिष्ठित मंदिर है। नेपाल में भी मां कुष्मांडा का एक प्राचीन मंदिर स्थित है। नवरात्रि के पावन दिनों में, इन मंदिरों में भक्तों की भीड़ देखने लायक होती है।
मां कुष्मांडा के लिए सिद्ध मंत्र
मां कुष्मांडा की आराधना के लिए यह मंत्र अत्यंत लाभकारी है:
“या देवी सर्वभूतेषु कुष्मांडा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नमः।।”
मां कुष्मांडा की आरती के साथ इस मंत्र का जाप करने से उनकी कृपा प्राप्त होती है।
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