पितृपक्ष की विदाई: जब पूर्वज लौटते हैं अपने अनंत धाम
पितृपक्ष, वह पावन अवसर जब हम अपने पूर्वजों की स्मृतियों में डूब जाते हैं, उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं। मान्यता है कि इस दौरान वे पृथ्वी पर पधारकर अपने वंशजों को स्नेह और आशीर्वाद प्रदान करते हैं। आश्विन माह की कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से अमावस्या तक चलने वाला यह पितृपक्ष, सर्वपितृ अमावस्या के साथ अपने समापन पर पहुँचता है, जो हमारे पूर्वजों के पृथ्वी लोक पर अंतिम दिन को चिह्नित करता है। तत्पश्चात, वे अपने स्थान को प्रस्थान कर जाते हैं। पर क्या आपने कभी सोचा है कि इस विदाई के उपरांत, हमारे पितर किस लोक में निवास करते हैं? आइए, इस लेख के माध्यम से इस रहस्य से पर्दा उठाते हैं।
पितृलोक: पूर्वजों का शाश्वत निवास
ज्योतिष शास्त्र और गहन धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, हमारे पूर्वज एक विशेष लोक में निवास करते हैं, जिसे ‘पितृलोक’ के नाम से जाना जाता है। यह लोक पृथ्वी और स्वर्ग के मध्य स्थित माना जाता है। प्रत्येक मनुष्य की आत्मा, देह त्यागने के उपरांत, इसी पितृलोक में अपना आश्रय पाती है।
पितृपक्ष के पावन दिनों में, यमराज विशेष अनुमति प्रदान करते हैं, जिससे आत्माएं अपने वंशजों से मिलने के लिए पृथ्वी लोक पर आ सकें। पितृपक्ष का समापन होते ही, पृथ्वी लोक के द्वार पुनः बंद हो जाते हैं और सभी पूर्वज अपने नियत स्थान, अर्थात पितृलोक की ओर लौट जाते हैं।
सर्वपितृ अमावस्या की रात्रि, जब पितृपक्ष का अंत होता है, तब यह माना जाता है कि समस्त पितर अपने लोक, पितृलोक की यात्रा पर निकल पड़ते हैं। इसी कारणवश, इस दिन पितरों के लिए भोजन और जल का विधान है। यह एक प्रतीकात्मक कृत्य है, जो हमारे पितरों के प्रति अगाध प्रेम और सम्मान को दर्शाता है, और उन्हें विदा करने की हमारी भावना को व्यक्त करता है। ऐसी मान्यता है कि संतुष्ट और प्रसन्नचित्त होकर जब पितर अपने लोक को प्रस्थान करते हैं, तो वे अपने वंशजों पर सुख-समृद्धि और खुशहाली की वर्षा करते हैं।
वहीं, वे पुण्यात्माएं जिनका श्राद्ध कर्म पूर्णतः सफल होता है, वे पितृलोक में ही नहीं रुकते, बल्कि मोक्ष की प्राप्ति कर स्वर्ग के अनमोल सुखों का अनुभव करते हैं, अथवा भगवान के निज धाम में रहकर उनकी सेवा करने का गौरव प्राप्त करते हैं।
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