राजस्थान में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी EWS आरक्षण के नियमों में बदलाव और उन्हें सरल बनाने की मांग को लेकर शिव से निर्दलीय विधायक रविंद्र सिंह भाटी 25 सितंबर से पांच दिवसीय पदयात्रा शुरू कर रहे हैं। भाटी ने इस अभियान को ‘सरलीकरण यात्रा’ नाम दिया है।
यह यात्रा बाड़मेर स्थित आलोक आश्रम से शुरू होकर पश्चिमी राजस्थान के अलग-अलग क्षेत्रों से गुजरते हुए जोधपुर में समाप्त होगी। भाटी का कहना है कि अभियान का उद्देश्य EWS से जुड़े नियमों को अधिक व्यावहारिक और जरूरतमंद परिवारों के लिए आसान बनाने की मांग को सामने रखना है।
EWS नियमों में बदलाव की क्या मांग?
भाटी EWS के लिए केंद्र और राजस्थान में लागू नियमों के बीच समानता की मांग कर रहे हैं। उनकी प्रमुख मांगों में EWS पात्रता में इस्तेमाल होने वाली जमीन की सीमा की समीक्षा, प्रमाण-पत्र की वैधता बढ़ाना और आवेदन प्रक्रिया को सरल करना शामिल है।
भाटी का तर्क है कि अलग-अलग इलाकों में जमीन की उत्पादकता, सिंचाई और आर्थिक उपयोगिता समान नहीं होती। ऐसे में केवल जमीन के क्षेत्रफल को आधार बनाकर पात्रता तय करने से पश्चिमी राजस्थान जैसे क्षेत्रों के कुछ परिवार प्रभावित हो सकते हैं। यह भाटी का राजनीतिक और नीतिगत तर्क है।
5 एकड़ के मानदंड पर सवाल
भाटी ने EWS पात्रता में जमीन से जुड़े मानदंड को लेकर विशेष तौर पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि बाड़मेर-जैसलमेर जैसे रेगिस्तानी इलाकों में पांच एकड़ जमीन की आर्थिक क्षमता की तुलना सिंचित और अधिक उत्पादक क्षेत्रों की जमीन से नहीं की जा सकती।
उनका प्रस्ताव है कि EWS पात्रता तय करते समय जमीन के क्षेत्रफल के साथ उसकी वास्तविक उत्पादकता, सिंचाई सुविधा और स्थानीय परिस्थितियों को भी ध्यान में रखा जाए।
EWS प्रमाण-पत्र की वैधता बढ़ाने की मांग
भाटी EWS प्रमाण-पत्र को हर साल नवीनीकृत कराने की जरूरत पर भी सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि पात्र परिवारों के लिए प्रमाण-पत्र की वैधता कम से कम तीन से पांच साल तक की जानी चाहिए।
इसके अलावा वह केंद्र और राज्य स्तर पर अलग-अलग EWS प्रमाण-पत्र की व्यवस्था को सरल करने की मांग कर रहे हैं। उनका तर्क है कि अलग-अलग प्रक्रियाओं के कारण पात्र युवाओं को सरकारी योजनाओं और प्रतियोगी परीक्षाओं में EWS लाभ लेने में परेशानी हो सकती है।
राजनीतिक प्रतिनिधित्व का मुद्दा भी जुड़ा
भाटी की मुहिम केवल प्रशासनिक सरलीकरण तक सीमित नहीं है। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक वह EWS वर्ग के लिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व का मुद्दा भी उठा रहे हैं। उनका कहना है कि आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए चुनाव लड़ना भी संसाधनों की वजह से मुश्किल होता है।
इसी संदर्भ में वह पंचायत चुनावों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में EWS वर्ग की भागीदारी का सवाल उठा रहे हैं। हालांकि राजनीतिक आरक्षण से जुड़ी उनकी मांग EWS नियमों के सरलीकरण से अलग एक व्यापक राजनीतिक प्रस्ताव है।
2023 में निर्दलीय विधायक बने भाटी
रविंद्र सिंह भाटी की राजनीतिक पहचान पश्चिमी राजस्थान से जुड़ी है। 2023 के राजस्थान विधानसभा चुनाव में उन्होंने शिव विधानसभा सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर जीत दर्ज की थी। चुनाव आयोग से जुड़े उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार उन्हें 79,495 वोट मिले और उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार फतेह खान को 3,950 वोटों से हराया।
इस चुनाव में कांग्रेस के अमीन खान और BJP के स्वरूप सिंह खारा भी मैदान में थे। भाटी की जीत ने शिव सीट के चुनाव परिणाम को राष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा में ला दिया था।
2024 लोकसभा चुनाव में मिले 5.86 लाख वोट
विधानसभा चुनाव के बाद भाटी ने 2024 लोकसभा चुनाव में बाड़मेर सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा। उन्हें 5,86,500 वोट मिले और वह कांग्रेस के उम्मेदा राम बेनीवाल के बाद दूसरे स्थान पर रहे। बेनीवाल को 7,04,676 वोट मिले, जबकि BJP के कैलाश चौधरी को 2,86,733 वोट मिले।
इस चुनावी प्रदर्शन के बाद पश्चिमी राजस्थान में भाटी की राजनीतिक सक्रियता और जनाधार को लेकर चर्चा और बढ़ी।
अब EWS मुद्दे को लेकर जनसंपर्क
25 सितंबर से शुरू होने वाली पदयात्रा के जरिए भाटी EWS से जुड़े मुद्दों को गांवों और स्थानीय लोगों के बीच ले जाने की तैयारी में हैं। यात्रा का रास्ता पश्चिमी राजस्थान के इलाकों से होकर जोधपुर तक जाएगा।
उनकी मांगों में नियमों की एकरूपता, जमीन के मानदंड की समीक्षा, प्रमाण-पत्र की लंबी वैधता और प्रक्रिया को आसान बनाना प्रमुख हैं। आने वाले दिनों में यह यात्रा EWS नियमों पर राज्य में राजनीतिक बहस का एक नया मुद्दा बन सकती है।
रविंद्र सिंह भाटी की पांच दिवसीय ‘सरलीकरण यात्रा’ राजस्थान में EWS आरक्षण के नियमों को लेकर चल रही बहस को राजनीतिक मंच पर ले जाने की उनकी कोशिश है। बाड़मेर से जोधपुर तक प्रस्तावित यात्रा में जमीन की सीमा, प्रमाण-पत्र की वैधता, केंद्र-राज्य नियमों में समानता और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दे प्रमुख रहेंगे। अब नजर इस बात पर होगी कि सरकार इन मांगों पर क्या प्रतिक्रिया देती है।
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