शंकराचार्य विवाद: उमा भारती के कड़े तेवर और विपक्ष की घेराबंदी, धर्म और प्रशासन के बीच ठनी
मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ भाजपा नेता उमा भारती के तीखे रुख ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद विवाद को एक नया राजनीतिक मोड़ दे दिया है। उमा भारती ने प्रशासन द्वारा स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से उनके ‘शंकराचार्य’ होने का प्रमाण मांगने की कड़ी भर्त्सना की है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह कदम प्रशासन की मर्यादाओं का खुला उल्लंघन है। उमा भारती का मानना है कि किसी के शंकराचार्य होने की पुष्टि करने का अधिकार केवल विद्वत परिषद और अन्य शंकराचार्यों को है, न कि प्रशासनिक अधिकारियों को।
इस मुद्दे ने न केवल भाजपा के भीतर मतभेदों को उजागर किया है, बल्कि विपक्षी दलों को भी सरकार पर हमला करने का मौका दे दिया है। कांग्रेस सांसद दीपेंद्र हुड्डा ने इस विवाद को ‘सत्ता का अहंकार’ करार देते हुए कहा कि भाजपा अब धर्म का अपमान करने पर उतारू है। उन्होंने शंकराचार्य से सबूत मांगने को पूरी तरह अस्वीकार्य बताया और मांग की कि भाजपा को स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से अविलंब माफी मांगनी चाहिए।
वहीं दूसरी ओर, प्रयागराज के संगम तट पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का संकल्प और गहरा होता जा रहा है। पिछले 10 दिनों से धरने पर बैठे स्वामी जी ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक उन्हें ससम्मान संगम स्नान का अधिकार नहीं मिलता, उनका विरोध जारी रहेगा। समाचार एजेंसी आईएएनएस से बात करते हुए उन्होंने कहा कि यह धरना तब तक चलेगा जब तक मर्यादा की बहाली नहीं होती। उन्होंने संकेत दिया कि यदि माघ मेला समाप्त भी हो गया, तो वे वापस जाएंगे और अगली बार फिर इसी स्थान पर अपनी मांग के लिए डटेंगे।
विवाद की जड़ें 17 जनवरी को मौनी अमावस्या के दिन से जुड़ी हैं। उस दिन स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपने पूरे लाव-लश्कर और पालकी के साथ संगम स्नान के लिए निकले थे, लेकिन पुलिस प्रशासन ने उन्हें रथ के साथ आगे बढ़ने से रोक दिया। इसी घटना ने एक बड़े विवाद का रूप ले लिया। स्वामी जी का आरोप है कि प्रशासन ने उनके साथ यह दुर्व्यवहार जानबूझकर किया है, जिसके विरोध में वे माघ मेले के बीच ही अनिश्चितकालीन धरने पर बैठ गए हैं।
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