जब हवा ज़हर बन जाए, तो सवालों के जाल बुनना ज़रूरी है!
दिल्ली-एनसीआर की हवा में घुलते ज़हर ने सुप्रीम कोर्ट की नींद उड़ा दी है। कोर्ट ने एयर क्वालिटी मैनेजमेंट कमीशन से कड़े सवाल दागे हैं, “प्रदूषण के इस भयावह स्तर को थामने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं? कितने एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग स्टेशन ज़िंदा हैं और कौन मौत की नींद सो चुका है?”
सुनवाई के दौरान, एमिकस क्यूरी अपराजिता सिंह ने एक सनसनीखेज खुलासा किया। मीडिया रिपोर्टें चीख-चीख कर कह रही हैं कि दिल्ली के एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग स्टेशन दम तोड़ रहे हैं। दिवाली की रात, जब हवा दीयों की रौशनी से नहीं, बल्कि ज़हरीले धुएं से भरी थी, तब 37 स्टेशनों में से महज़ 9 ही साँस ले रहे थे।
अपराजिता सिंह ने कोर्ट के सामने वो कड़वी हकीकत रखी, “अगर हमारे पहरेदार ही सो जाएं, तो ज़हर को पकड़ेंगे कौन? कैसे पता चलेगा कि आफत का कौन सा पहर चल रहा है? क्या हम ऐसे ही अंधेरे में तीर चलाते रहेंगे?”
उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि मॉनिटरिंग स्टेशनों की लाचारी को तुरंत ठीक करना होगा। कमीशन को अपनी पूरी चाल-ढाल बतानी होगी, “दिल्ली की हवा को और ज़हरीला होने से रोकने के लिए आपकी क्या तरकीब है? आपका प्लान क्या है?” क्योंकि, “अगर इन स्टेशनों की बात पर भरोसा ही नहीं, तो प्रदूषण को कंट्रोल करने के सारे जतन बेकार हैं।”
कोर्ट ने भी माना कि इस ज़हरीली हवा का सीधा असर लोगों की जान पर पड़ रहा है। इसलिए, एयर क्वालिटी मैनेजमेंट कमीशन को अब सारे मॉनिटरिंग स्टेशनों की जीवन-रेखा का पूरा ब्यौरा देना होगा और ये पक्का करना होगा कि ज़रूरी आंकड़े समय पर हमारी मेज पर आएं।
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