लोकतंत्र के गिरते स्तर की समान चिंता ने एक दिन उन्हें त्रिलोचन शास्त्री से मिलवाया। दोनों ही इस बिगड़ती सूरत को बदलने का दृढ़ संकल्प रखते थे। उनकी लगातार गहन चर्चाओं ने ही आगे का मार्ग प्रशस्त किया। फलस्वरूप, 1999 में उन्होंने मिलकर ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ (ADR) की नींव रखी। अब उन्हें अपना लक्ष्य स्पष्ट दिख रहा था।
इसी दूरदर्शिता के चलते, छोकर ने आईआईएम में रहते हुए ही कानून की पढ़ाई शुरू की और 2005 में अपनी सेवानिवृत्ति से पहले एलएलबी की डिग्री भी हासिल कर ली। उनका यह कानूनी ज्ञान सिर्फ उनके लिए ही नहीं, बल्कि आगे चलकर पूरे देश के लिए एक अमूल्य धरोहर साबित हुआ।
बीते करीब ढाई दशकों में, उन्होंने लोकतंत्र को बचाने और उसे सशक्त बनाने की यह लड़ाई अथक प्रयास से लड़ी। यह छोकर का ही जुझारू संघर्ष था जिसके परिणाम स्वरूप यह ऐतिहासिक नियम बना कि चुनाव लड़ने वाले प्रत्येक उम्मीदवार को अपनी संपत्ति और आपराधिक रिकॉर्ड का विस्तृत ब्यौरा सार्वजनिक करना होगा, जिसे चुनाव आयोग की वेबसाइट पर अनिवार्य रूप से अपलोड किया जाएगा। उनकी विशेषज्ञता ऐसी थी कि चुनाव आयोग के किसी भी फैसले के संभावित परिणामों को समझने के लिए राजनेता, पत्रकार और विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ उन्हीं की राय लेते थे।
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