7 जंग, भ्रष्टाचार और ICC का चक्रव्यूह: बेंजामिन नेतन्याहू — रक्षक या युद्ध अपराधी?

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7 जंग, भ्रष्टाचार और ICC का चक्रव्यूह: बेंजामिन नेतन्याहू — रक्षक या युद्ध अपराधी?
बेंजामिन नेतन्याहू: राजनीतिक यात्रा (ai generated)

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बेंजामिन नेतन्याहू: राजनीति के ध्रुव और आधुनिक इजराइल की अनसुलझी पहेली

बेंजामिन नेतन्याहू ने इजराइल की राजनीति में एक ऐसा स्थान हासिल कर लिया है, जहां उनकी मौजूदगी ही नहीं, बल्कि उनकी अनुपस्थिति भी राजनीतिक विमर्श का केंद्र बन जाती है. समर्थकों के लिए वे एक ‘अजेय रक्षक’ हैं, जो ईरान और आतंकवाद जैसे क्षेत्रीय दुश्मनों से देश की सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं. वहीं, उनके आलोचकों की नजर में वे एक ऐसे व्यक्तित्व हैं जिन्होंने इजराइल को अंतहीन युद्ध, संस्थागत टकराव और अंतरराष्ट्रीय अलगाव के मुहाने पर खड़ा कर दिया है.

उनकी इस लंबी कहानी को किसी एक विशेषण में बांधना कठिन है, क्योंकि उनके कार्यकाल में जितनी रणनीतिक ऊंचाइयां दिखीं, उतनी ही गहरी विफलताएं भी सामने आईं, जिनके जवाब आज भी तलाशे जा रहे हैं.

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नेतन्याहू: एक विचारधारा और व्यक्तित्व का निर्माण

नेतन्याहू की राजनीतिक चेतना को समझने के लिए उनके पारिवारिक इतिहास में झांकना अनिवार्य है. उनके पिता, बेंजियन नेतन्याहू, यहूदी इतिहास के प्रखर विद्वान थे और ‘संशोधनवादी जियोनिज्म’ की बौद्धिक परंपरा के संवाहक थे. यह विचारधारा यहूदी राष्ट्रीय अधिकारों, ऐतिहासिक दावों और राष्ट्र की सुरक्षा को सर्वोपरि मानती है.

इसी पृष्ठभूमि ने नेतन्याहू को आतंकवाद के खिलाफ एक अंतरराष्ट्रीय और कठोर दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रेरित किया. उनके लिए आतंकवाद केवल कानून-व्यवस्था का संकट नहीं, बल्कि अस्तित्व की लड़ाई है.

एक महत्वपूर्ण विश्लेषण: नेतन्याहू की सुरक्षा-केंद्रित राजनीति को केवल व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा कहना अधूरा होगा. इजराइल का इतिहास युद्धों, आत्मघाती हमलों और बंधक संकटों से भरा है, जो वहां की वास्तविक सुरक्षा चिंताओं को जन्म देते हैं. हालांकि, सुरक्षा की यह आवश्यकता सरकार के हर सैन्य या राजनीतिक निर्णय को स्वतः जायज नहीं ठहरा देती. सुरक्षा की ‘जरूरत’ और अपनाए गए ‘तरीकों की वैधता’—ये दो अलग बहस के विषय हैं.

1996: सत्ता का उदय और राजनीति की नई शैली

90 के दशक में नेतन्याहू का उदय उस वक्त हुआ जब इजराइल शांति और सुरक्षा के दोराहे पर खड़ा था. 1993 के ओस्लो समझौते ने फिलिस्तीन के साथ बातचीत की उम्मीद जगाई थी, लेकिन समाज में गहरा अविश्वास था. 1995 में प्रधानमंत्री यित्जाक राबिन की हत्या ने इस विभाजन को और बढ़ा दिया.

1996 के चुनाव में नेतन्याहू ने ‘सुरक्षा’ को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया और मामूली अंतर से जीत दर्ज की. हालांकि उन्होंने फिलिस्तीनियों के साथ बातचीत पूरी तरह बंद नहीं की. 1997 के ‘हेब्रोन समझौते’ और 1998 के ‘वाई रिवर मेमोरेंडम’ इसके गवाह हैं.

यह तथ्य उनके उन आलोचकों को चुनौती देता है जो मानते हैं कि उन्होंने कभी संवाद का रास्ता नहीं अपनाया. उनकी रणनीति जटिल थी: बातचीत को स्वीकार करना, लेकिन उसकी शर्तों और क्षेत्रीय परिणामों पर अपना कड़ा नियंत्रण बनाए रखना. दूसरी ओर, आलोचकों का तर्क है कि इसी दृष्टिकोण ने शांति प्रक्रिया को धीमा कर भविष्य के विश्वास को कमजोर किया.

1999 में हार के बाद भी नेतन्याहू राजनीति से दूर नहीं हुए. उन्होंने वित्त मंत्री के रूप में इजराइली अर्थव्यवस्था का उदारीकरण किया, निजीकरण को बढ़ावा दिया और देश को एक तकनीकी शक्ति (High-Tech Economy) बनाने की नींव रखी, भले ही इससे सामाजिक असमानता पर सवाल उठे.

2009-2021: निरंतरता और ‘सुरक्षा ब्रांड’ का स्वर्ण युग

2009 में दोबारा सत्ता में आने के बाद नेतन्याहू ने गठबंधन की राजनीति में महारत हासिल कर ली. उनकी राजनीति के तीन स्तंभ थे:

  1. सुरक्षा: ईरान, हमास और हिजबुल्लाह के खतरों को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में रखना.
  2. अर्थव्यवस्था: इजराइल को तकनीकी और निवेश का वैश्विक केंद्र बनाना.
  3. कूटनीति: अमेरिका के साथ रणनीतिक निकटता और नए क्षेत्रीय मित्र तलाशना.

उनके समर्थकों के लिए यह नीति इजराइल को मजबूत बनाने वाली थी, जबकि आलोचकों ने माना कि सुरक्षा संकटों को लगातार मुद्दा बनाने से दीर्घकालिक समाधानों की संभावना खत्म हो गई.

ईरान और क्षेत्रीय चुनौती: सुरक्षा नीति की धुरी

नेतन्याहू की विदेश नीति में ईरान सबसे बड़ा दुश्मन रहा है. उनका निरंतर तर्क रहा है कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम और उसके द्वारा समर्थित सशस्त्र समूह (हमास, हिजबुल्लाह) इजराइल के अस्तित्व के लिए खतरा हैं. उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ईरान के खिलाफ एक आक्रामक अभियान का नेतृत्व किया.

अमेरिका के साथ संबंध: ओबामा का तनाव बनाम ट्रंप की दोस्ती

अमेरिका के साथ इजराइल के संबंध नेतन्याहू के दौर में उतार-चढ़ाव भरे रहे. बराक ओबामा के कार्यकाल में ईरान परमाणु समझौते को लेकर दोनों के बीच अभूतपूर्व कड़वाहट देखी गई. 2015 में अमेरिकी कांग्रेस में नेतन्याहू का भाषण इसका चरम बिंदु था.

इसके विपरीत, डोनाल्ड ट्रंप का दौर नेतन्याहू के लिए कूटनीतिक जीत का काल था. यरुशलम को राजधानी की मान्यता, गोलान हाइट्स पर इजराइली संप्रभुता और 2020 के अब्राहम समझौते ने इस रिश्ते को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया.

एक तथ्य यह भी: यह कहना कि अमेरिका का समर्थन केवल नेतन्याहू की व्यक्तिगत उपलब्धि थी, गलत होगा. अमेरिकी रक्षा हित और संस्थागत संबंध भी उतने ही महत्वपूर्ण रहे हैं, भले ही नेतृत्व के स्तर पर मतभेद रहे हों.

अब्राहम समझौते: अरब जगत में कूटनीतिक क्रांति

2020 में संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन और मोरक्को के साथ संबंधों का सामान्य होना नेतन्याहू की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है. इसने इस पुराने भ्रम को तोड़ दिया कि इजराइल के अरब देशों से संबंध केवल फिलिस्तीनी मुद्दे के हल के बाद ही सुधर सकते हैं.

लेकिन इसकी अपनी सीमाएं भी थीं. अरब सरकारों से हाथ मिलाना और वहां की जनता का दिल जीतना दो अलग बातें हैं. गाजा युद्ध के बाद सऊदी अरब के साथ संभावित समझौतों पर ब्रेक लगना यह दर्शाता है कि फिलिस्तीन मुद्दे को दरकिनार कर स्थायी शांति पाना मुश्किल है.

भारत और मोदी: रणनीतिक साझेदारी का नया अध्याय

नेतन्याहू के कार्यकाल में भारत और इजराइल के रिश्ते ‘साझेदारी’ से बढ़कर ‘रणनीतिक निकटता’ तक पहुंचे.

एक विश्लेषण: भारत-इजराइल के बढ़ते संबंधों को केवल धार्मिक या वैचारिक चश्मे से देखना गलत होगा. यह रक्षा, कृषि, तकनीक और सुरक्षा हितों पर आधारित एक ठोस संप्रभु रिश्ता है. हालांकि, इस साझेदारी के बीच भारत ने फिलिस्तीन और अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानूनों पर अपनी परंपरागत नीति को भी संतुलित रखा है.

रूस और पुतिन: रणनीतिक व्यावहारिकता

नेतन्याहू ने व्लादिमीर पुतिन के साथ भी निरंतर संवाद बनाए रखा. सीरिया में रूस की मौजूदगी के बीच यह संवाद जरूरी था ताकि ईरानी प्रभाव को सीमित किया जा सके और सैन्य गलतफहमियों से बचा जा सके. यह नेतन्याहू की बहु-दिशात्मक कूटनीति का प्रमाण था, हालांकि इसकी प्रभावशीलता पर समय-समय पर सवाल भी उठते रहे.

7 अक्टूबर 2023: ‘मिस्टर सिक्योरिटी’ की छवि पर गहरा घाव

हमास द्वारा 7 अक्टूबर के हमले ने इजराइल की सुरक्षा के दावे को हिलाकर रख दिया. यह नेतन्याहू के करियर की सबसे बड़ी विफलता मानी जाती है. जिस नेता ने वर्षों तक खुद को सुरक्षा का एकमात्र विकल्प बताया, उसी के कार्यकाल में देश को इतना बड़ा जख्म मिला.

आलोचकों का मानना है कि उनकी सरकार ने हमास के खतरे को कम आंका. संसद में इस विफलता की जांच को लेकर भी विवाद जारी है. क्या इसके लिए केवल खुफिया एजेंसियां जिम्मेदार थीं या प्रधानमंत्री की राजनीतिक प्राथमिकताएं? यह प्रश्न भविष्य की जांच के केंद्र में रहेगा.

भ्रष्टाचार के मुकदमे और न्यायिक सुधार का विवाद

नेतन्याहू की विरासत भ्रष्टाचार के आरोपों और न्यायिक सुधारों के विवाद से भी घिरी है. 2019 में उन पर रिश्वत और धोखाधड़ी के आरोप लगे. उनके समर्थकों ने इसे ‘राजनीतिक शिकार’ कहा, जबकि विरोधियों ने इसे लोकतंत्र की मर्यादा का उल्लंघन माना.

2023 में न्यायपालिका की शक्तियों को कम करने के सरकारी प्रस्ताव ने इजराइल को दो हिस्सों में बांट दिया. सड़कों पर लाखों लोग उतरे. यह बहस केवल कानून की नहीं थी, बल्कि इजराइल के लोकतंत्र के चरित्र की थी—निर्वाचित सरकार बनाम स्वतंत्र न्यायपालिका.

क्या नेतन्याहू ने इजराइल को अलग-थलग कर दिया?

यह प्रश्न उनकी विरासत का सबसे विवादास्पद हिस्सा है. एक ओर उन्होंने अब्राहम समझौतों के जरिए नए दोस्त बनाए, तो दूसरी ओर गाजा युद्ध और फिलिस्तीन नीति ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इजराइल की ‘नैतिक वैधता’ पर सवाल खड़े कर दिए. सैन्य शक्ति महत्वपूर्ण है, लेकिन कूटनीतिक वैधता के बिना दीर्घकालिक शांति कठिन है.

दावों का विश्लेषण: क्या है हकीकत?

  1. शांति की कोशिश: उन्होंने कुछ समझौते जरूर किए, लेकिन फिलिस्तीनी समस्या का कोई अंतिम समाधान पेश नहीं कर पाए.
  2. 7 अक्टूबर की जिम्मेदारी: प्रधानमंत्री के रूप में वे जवाबदेही से बच नहीं सकते, हालांकि सुरक्षा तंत्र की सामूहिक विफलता की जांच भी उतनी ही जरूरी है.
  3. कूटनीतिक उपलब्धियां: अब्राहम समझौते और भारत से रिश्ते कोई ‘प्रचार’ नहीं, बल्कि ठोस वास्तविकताएं हैं, भले ही उनकी सीमाएं रही हों.

निष्कर्ष: शक्ति, कूटनीति और जवाबदेही की कसौटी

बेंजामिन नेतन्याहू की विरासत का मूल्यांकन तीन पैमानों पर होगा:

  • सुरक्षा: क्या 7 अक्टूबर के बाद इजराइल वाकई पहले से अधिक सुरक्षित है?
  • कूटनीति: क्या उनके बनाए रिश्ते गाजा युद्ध के बाद के क्षेत्रीय अविश्वास को झेल पाएंगे?
  • लोकतंत्र: क्या उनके कार्यकाल में इजराइल की लोकतांत्रिक संस्थाएं मजबूत हुईं या कमजोर?

इतिहास किसी नेता को केवल उसके शासन की अवधि से नहीं, बल्कि इस बात से आंकता है कि उसने अपने देश को किस स्थिति में छोड़ा. क्या नेतन्याहू ने इजराइल को एक स्थायी सुरक्षा दी, या ऐसे संकटों की विरासत छोड़ दी जिसका बोझ अगली पीढ़ियों को उठाना होगा? यह सवाल आज भी अनुत्तरित है.

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