इतिहास गवाह है कि जब भी दुनिया किसी गहरे संकट के मुहाने पर खड़ी हुई है, समाधान के लिए उसकी निगाहें हमेशा भारत की ओर मुड़ी हैं। लेकिन 12-13 सितंबर 2026 को दिल्ली की सरजमीं पर जो महामंच सजने जा रहा है, वैसा मंजर विश्व ने दशकों से नहीं देखा होगा। यह प्रधानमंत्री और राष्ट्रपतियों की महज एक औपचारिक मुलाकात नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति का वह ‘कुरुक्षेत्र’ है, जहाँ दुनिया का नया भूगोल और नया इतिहास लिखा जाएगा। दिल्ली में आरआईसी (रूस, भारत, चीन) का वह शक्तिशाली त्रिकोण बनने वाला है, जिसकी पदचाप मात्र से व्हाइट हाउस से लेकर नाटो मुख्यालयों तक खलबली मची हुई है।
कूटनीति में ‘आरआईसी’ एक ऐसा शब्द है जो सालों तक सिर्फ कागजों की शोभा बढ़ाता रहा, लेकिन 2026 की दिल्ली समिट इसे हकीकत के धरातल पर उतारने जा रही है। कल्पना कीजिए, जब दुनिया की तीन सबसे बड़ी सेनाएं, तीन विशाल अर्थव्यवस्थाएं और तीन परमाणु शक्तियां एक ही मेज पर चाय की चुस्कियों के साथ भविष्य का एजेंडा तय करेंगी, तो वैश्विक शक्ति का संतुलन किस कदर बदलेगा? पश्चिम की बेचैनी इस साथ से ज्यादा इनके हाथ में मौजूद ‘डीडॉलराइजेशन’ के हथियार को लेकर है।
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अगर दिल्ली में इन तीनों महाशक्तियों ने डॉलर के विकल्प के रूप में अपनी मुद्राओं में व्यापार पर अंतिम मुहर लगा दी, तो अमेरिकी डॉलर का साम्राज्य ताश के पत्तों की तरह ढह सकता है। यह समिट दुनिया को कड़ा संदेश दे रही है कि अब वैश्विक सत्ता का ‘रिमोट कंट्रोल’ वाशिंगटन में नहीं, बल्कि नई दिल्ली के सम्मेलन कक्ष में होगा। इस आयोजन की सबसे बड़ी सुर्खी है चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का भारत आगमन। अक्टूबर 2019 में जब वे भारत आए थे, तब स्थितियां कुछ और थीं, लेकिन 2020 की गलवान घाटी की हिंसक झड़प ने रिश्तों में दशकों की कड़वाहट घोल दी। अब 5 साल बाद जिनपिंग का दिल्ली आना कोई सामान्य कूटनीतिक दौरा नहीं है। अक्टूबर 2024 के कजान समझौते के बाद जो ‘वार्म-अप’ शुरू हुआ था, उसका फाइनल मैच अब दिल्ली में खेला जाएगा। क्या मोदी और जिनपिंग की द्विपक्षीय बातचीत एलएसी पर स्थायी शांति का मार्ग प्रशस्त करेगी? अगर भारत-चीन आर्थिक संबंधों की नई शुरुआत होती है, तो यह एशिया के ‘स्वर्ण युग’ का आगाज होगा, जो पश्चिमी देशों के लिए किसी बुरे सपने जैसा है।
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हालांकि, इस बार ब्रिक्स की मेज पर पुराने घिसे-पिटे मुद्दे नहीं, बल्कि तीन नए और बेहद संवेदनशील विषयों पर मंथन होगा। पहला मुद्दा: ईरान का शक्ति प्रदर्शन और चाबहार का रणनीतिक मार्ग। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान का दिल्ली आना एक कूटनीतिक मास्टरस्ट्रोक है। एक तरफ जहां इजरायल और अमेरिका के साथ ईरान के युद्ध जैसे हालात हैं, वहीं दूसरी तरफ भारत के साथ उसका पुराना सांस्कृतिक और रणनीतिक जुड़ाव। दिल्ली में पेजेश्कियान न सिर्फ अपनी बात रखेंगे, बल्कि चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट को नई ऊर्जा देंगे, जो भारत को मध्य एशिया और रूस तक सीधा और सुगम रास्ता प्रदान करता है। यह कॉरिडोर स्वेज नहर का सबसे सशक्त विकल्प बनकर उभर सकता है।
दूसरा मुद्दा: बांग्लादेश और भारत की ‘बड़े भाई’ वाली भूमिका। भारत ने बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री तारिक रहमान को आमंत्रित कर स्पष्ट कर दिया है कि ब्रिक्स सिर्फ बड़े देशों का क्लब नहीं है। बिम्सटेक (Bimstek) के अध्यक्ष के रूप में उनकी मौजूदगी दक्षिण एशिया में भारत की ‘पड़ोसी प्रथम’ नीति का सबसे बड़ा प्रमाण है। भारत यहाँ एक ऐसे सेतु की भूमिका में है जो छोटे देशों की आवाज को वैश्विक मंच पर मजबूती दे रहा है। तीसरा मुद्दा: फिलिस्तीन और मिडिल ईस्ट की पेचीदा गुत्थी। ब्रिक्स के भीतर एक नई दरार दिखाई दे रही है—ईरान और यूएई आमने-सामने हैं। यूएई जहां फिलिस्तीन मुद्दे पर नरम भाषा का पक्षधर है, वहीं रूस, चीन और ईरान एक बेहद सख्त रुख चाहते हैं। यहाँ पीएम मोदी की भूमिका एक ‘ग्लोबल मीडिएटर’ के रूप में निखरेगी।
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प्रधानमंत्री मोदी को इन दोनों धड़ों के बीच तालमेल बिठाना होगा ताकि एक साझा घोषणापत्र जारी हो सके। जनवरी 2024 में ब्रिक्स का विस्तार दुनिया के लिए जश्न का विषय था, लेकिन अब यही विस्तार भारत के लिए बड़ी कूटनीतिक चुनौती है। ईरान और यूएई का तनाव ब्रिक्स के पहियों को जाम कर सकता है। मई में विदेश मंत्रियों की बैठक का बिना किसी साझा बयान के खत्म होना एक गंभीर चेतावनी थी। पूरी दुनिया की नजरें इस पर टिकी हैं कि क्या भारत अपनी मेजबानी में इन दोनों इस्लामिक देशों को एक मेज पर ला पाएगा? पीएम मोदी के निजी संबंध सऊदी अरब के किंग सलमान, यूएई के जायद और ईरानी नेतृत्व—तीनों के साथ बेहतरीन हैं। अगर दिल्ली समिट में ‘टू-स्टेट सॉल्यूशन’ पर कोई ऐतिहासिक समझौता होता है, तो पूरी दुनिया भारत की कूटनीति का लोहा मानेगी।
अंत में सबसे बड़ा सवाल: क्या ब्रिक्स अपनी साझा मुद्रा लाएगा? आर्थिक जानकारों का मानना है कि साझा मुद्रा कठिन है क्योंकि भारत और चीन की अर्थव्यवस्थाओं का ढांचा अलग है। लेकिन समाधान एक साझा करेंसी नहीं, बल्कि ‘यूनिट ऑफ अकाउंट’ हो सकता है। एक ऐसा सिस्टम जहाँ व्यापार स्वर्ण (गोल्ड) या स्थानीय मुद्राओं के बास्केट के आधार पर हो। अगर ऐसा हुआ, तो ‘ब्रेटन वुड्स-2’ का ताश का महल ढह जाएगा और अमेरिका अपनी आर्थिक धौंस से दुनिया को डरा नहीं पाएगा, क्योंकि तब दुनिया के पास व्यापार के सशक्त विकल्प मौजूद होंगे।
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