बांग्लादेश में खूनी तांडव: क्या संवैधानिक शासन का अंत हो गया?
हाल के दिनों में बांग्लादेश में जिस तरह की हिंसा, आगजनी, सामूहिक हमले, जबरन गायब करना और निर्मम हत्याएं बढ़ी हैं, वह किसी भी सभ्य समाज के लिए चिंता का विषय है। यह कोई अचानक या अलग-थलग होने वाली घटनाएं नहीं हैं। ये जुलाई-अगस्त 2024 के दौरान हुए सोचे-समझे दंगों और तबाही के अभियान का सीधा परिणाम हैं, जिसने प्रधानमंत्री शेख हसीना और बांग्लादेश अवामी लीग के नेतृत्व वाली संवैधानिक, लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार को सत्ता से बेदखल कर दिया।
छात्र संगठन का कहना है कि हसीना सरकार के पतन के बाद, देश में संवैधानिक शासन की जगह भीड़तंत्र ने ले ली है। यह भीड़तंत्र व्यवस्थित हिंसा, डर और दंड से मुक्ति के माहौल को बढ़ावा दे रहा है।
बीएसएल का यह भी मानना है कि मीडिया संस्थानों, सांस्कृतिक संगठनों, अल्पसंख्यक समुदायों, राजनीतिक दलों और ऐतिहासिक राष्ट्रीय स्मारकों पर सुनियोजित हमले इस बात का संकेत देते हैं कि बांग्लादेश में अब कानून का राज नहीं बचा है। देश को जानबूझकर अराजकता, सरकारी विफलता और डर से संचालित एक तानाशाही शासन की ओर धकेला जा रहा है।
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