जब समंदर की लहरों पर भारतीय नौसेना अपना पराक्रम दिखाती है, तो दुश्मनों के हौसले पस्त हो जाते हैं। हाल ही में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने जर्मनी की धरती पर एक ऐसा कदम रखा है, जिसकी धमक 5310 किमी दूर पाकिस्तान तक सुनाई दे रही है। भारत के इस कूटनीतिक ‘तहलके’ ने इस्लामाबाद में शहबाज शरीफ और असीम मुनीर की रातों की नींद उड़ा दी है। आज के दौर में युद्ध केवल जमीन या आसमान तक सीमित नहीं है, बल्कि असली जंग समंदर की उन गहराइयों में लड़ी जाती है जहाँ दुश्मन अदृश्य रहकर भी तबाही मचाने की ताकत रखता है।
मिडिल ईस्ट में बढ़ता तनाव, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की अनिश्चित नीतियां और हिंद महासागर में चीन की बढ़ती घुसपैठ के बीच भारत ने जर्मनी में जो दांव खेला है, उसने वैश्विक राजनीति में हलचल मचा दी है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का यह दौरा महज एक औपचारिक यात्रा नहीं, बल्कि भारत की समुद्री शक्ति को नई ऊंचाइयों पर ले जाने वाली एक सोची-समझी रणनीति है। बर्लिन में भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए उन्होंने भारत-जर्मनी के 75 साल पुराने अटूट रिश्तों पर जोर दिया। आज जर्मनी न केवल यूरोप में भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, बल्कि 2000 से अधिक जर्मन कंपनियां भारत की प्रगति में हिस्सेदार हैं।
इस मिशन का सबसे बड़ा उद्देश्य समंदर के नीचे भारत की मारक क्षमता को कई गुना बढ़ाना है। भारत और जर्मनी के बीच करीब 5.2 बिलियन डॉलर (करीब 45,000 करोड़ रुपये) की पनडुब्बी डील पर चर्चा तेज हो गई है, जिसे प्रोजेक्ट 75i का नाम दिया गया है। इस मेगा डील की खास बात यह है कि जर्मनी न केवल आधुनिक पनडुब्बियां देगा, बल्कि अपनी एडवांस टेक्नोलॉजी भी भारत को ट्रांसफर करेगा। यानी ये पनडुब्बियां ‘मेक इन इंडिया’ के तहत स्वदेशी होंगी, जिससे भारत अब सिर्फ हथियार खरीदार नहीं बल्कि एक निर्माता शक्ति बनकर उभरेगा।
इस दौरे की सबसे रोमांचक झलक तब दिखी जब राजनाथ सिंह ने जर्मनी की घातक ‘टाइप 212’ पनडुब्बी का बारीकी से निरीक्षण किया। यह पनडुब्बी आखिर इतनी खतरनाक क्यों है? इसकी तीन बड़ी खूबियां इसे समंदर का ‘अदृश्य शिकारी’ बनाती हैं:
- साइलेंट अंडरवाटर मूवमेंट: यह पानी के भीतर इतनी खामोशी से चलती है कि दुश्मन के अत्याधुनिक रडार भी इसकी आहट नहीं पा सकते।
- स्टेल्थ डिजाइन: इसकी बनावट और तकनीक ऐसी है कि यह सोनार और सेंसर की पकड़ से पूरी तरह बाहर रहती है।
- डीप सी एंडोरेंस: यह पनडुब्बी बिना सतह पर आए, हफ़्तों तक समंदर की अगाध गहराइयों में रहकर अपने मिशन को अंजाम देने में सक्षम है।
साफ है कि राजनाथ सिंह का यह जर्मन मिशन बीजिंग से लेकर इस्लामाबाद तक के लिए एक कड़ा संदेश है कि अब समंदर की गहराइयों में भी भारत का ही राज होगा।
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