भारत-अमेरिका ट्रेड डील: कूटनीतिक दांवपेच या महज बयानबाजी? भारत ने अमेरिका को दिखाया आईना
भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक रिश्तों की डोर पिछले साल 13 फरवरी से ही खींचतान और समझौतों के बीच झूल रही है। दोनों देश एक संतुलित और पारस्परिक लाभ वाले व्यापार समझौते के लिए प्रतिबद्ध तो थे, लेकिन हकीकत में यह बातचीत कई दौर के विवादों की भेंट चढ़ गई। अमेरिका की ओर से भारत पर लगातार टैरिफ का दबाव बनाया गया। रूस के साथ भारत की प्रगाढ़ होती दोस्ती ने वॉशिंगटन को इतना चुभाया कि उसने टैरिफ में सीधे 25% का इजाफा कर दिया, जिससे कुल भार 50% तक जा पहुंचा। पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप ने भी अपने बयानों से भारत की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। हाल ही में उन्होंने दावा किया कि भारत उनसे मिलने के लिए मिन्नतें कर रहा था। इतना ही नहीं, उन्होंने 68 अपाचे हेलीकॉप्टरों के ऑर्डर का भ्रामक आंकड़ा पेश किया, जबकि असल संख्या महज 28 है। अब एक ताजा बयान ने आग में घी डालने का काम किया है, जिस पर भारत ने बेहद सख्त प्रतिक्रिया दी है।
विवाद की नई वजह अमेरिकी वाणिज्य मंत्री हॉवर्ड लटनिक का वह बयान है जिसे भारतीय विदेश मंत्रालय ने पूरी तरह ‘गलत’ करार देते हुए खारिज कर दिया है। लटनिक ने एक पॉडकास्ट में दावा किया कि पिछले साल दोनों देशों के बीच ट्रेड डील सिर्फ इसलिए परवान नहीं चढ़ सकी क्योंकि पीएम नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रपति ट्रंप को फोन नहीं किया था। लटनिक के अनुसार, 13 फरवरी की व्हाइट हाउस बैठक में डील की पूरी रूपरेखा तैयार थी, लेकिन पीएम मोदी शिष्टाचार के उस कॉल के लिए सहज नहीं थे। उन्होंने यह भी कहा कि भारत के हाथ खींचने के बाद अमेरिका ने इंडोनेशिया, फिलीपींस और वियतनाम के साथ समझौते कर लिए।
भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने इस भ्रम को तथ्यों के साथ तोड़ा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि साल 2025 में ही प्रधानमंत्री मोदी और डोनाल्ड ट्रंप के बीच आठ बार फोन पर बातचीत हुई थी, जिसमें द्विपक्षीय संबंधों के हर पहलू पर चर्चा की गई। जायसवाल ने जोर देकर कहा कि दोनों देश डील के काफी करीब थे। इसी बीच, कूटनीतिक सरगर्मी बढ़ाते हुए अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर नई दिल्ली पहुंच चुके हैं और वे सोमवार को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से मुलाकात करेंगे।
ट्रेड डील और फोन कॉल: दावों की हकीकत
हॉवर्ड लटनिक का यह तर्क तर्कसंगत नहीं लगता। रिकॉर्ड बताते हैं कि इंडोनेशिया, वियतनाम और फिलीपींस के साथ अमेरिका की डील जुलाई 2025 में ही संपन्न हो चुकी थी। अगर वॉशिंगटन ने जुलाई में ही तय कर लिया था कि पीएम मोदी के फोन न करने की वजह से डील नहीं होगी, तो उसके बाद भी महीनों तक बातचीत जारी रहने का कोई तुक नहीं बनता। सच तो यह है कि ट्रेड डील जैसे गंभीर विषय टैरिफ, कृषि और रेगुलेटरी ऑटोनॉमी जैसे जटिल नीतिगत मुद्दों पर टिके होते हैं। इसे नेताओं के निजी फोन कॉल से जोड़ना न केवल वास्तविकता से परे है, बल्कि वैश्विक व्यापार की समझ पर भी सवाल खड़ा करता है।
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