ज्ञानेश कुमार पर महाभियोग की तलवार! संगीन आरोपों के बाद भी आखिर क्यों सुरक्षित है उनकी कुर्सी?

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ज्ञानेश कुमार पर महाभियोग की तलवार! संगीन आरोपों के बाद भी आखिर क्यों सुरक्षित है उनकी कुर्सी?
ज्ञानेश कुमार पर लगे गंभीर आरोप, महाभियोग की तैयारी; फिर भी पद से हटाना क्यों है बेहद मुश्किल?

महाभियोग या पद्मश्री? मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर छिड़ी ‘सियासी जंग’, जानें क्या है पूरा विवाद

मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार इन दिनों भारतीय राजनीति के केंद्र में हैं। जहां एक तरफ कांग्रेस समेत पूरा विपक्ष उनके खिलाफ सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन कर रहा है, वहीं संसद के आगामी शीतकालीन सत्र में उन्हें पद से हटाने के लिए महाभियोग लाने की तैयारी भी तेज हो गई है। दूसरी ओर, सत्ताधारी एनडीए की प्रमुख पार्टी बीजेपी पूरी मजबूती से उनके बचाव में खड़ी है। विवाद इस कदर बढ़ गया है कि जहां विपक्ष उन पर केस चलाने की मांग कर रहा है, वहीं बंगाल बीजेपी अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य ने उन्हें ‘पद्मश्री’ देने तक की वकालत कर दी है।

आइए विस्तार से समझते हैं कि आखिर यह पूरा बवाल क्या है, ज्ञानेश कुमार पर क्या आरोप हैं और उन्हें हटाना विपक्ष के लिए लोहे के चने चबाने जैसा क्यों है?

ज्ञानेश कुमार पर लगे गंभीर आरोप

एक अंग्रेजी अखबार की रिपोर्ट ने चुनाव आयोग की अंदरूनी कलह और वोटर लिस्ट में बदलावों को लेकर सनसनीखेज खुलासे किए हैं। रिपोर्ट में मुख्य रूप से दो आरोप लगाए गए हैं:

  • वोटर लिस्ट से 13 करोड़ नाम गायब: ज्ञानेश कुमार पर ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) के नाम पर धांधली का आरोप है। दावा है कि 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से करीब 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम हटा दिए गए।
  • सहयोगियों की आपत्तियों को नजरअंदाज करना: आरोप है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने फॉर्म-6 में बदलाव, डेटा के केंद्रीकरण और नाम जोड़ने-हटाने की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए थे। पिछले 10 महीनों में आयोग के भीतर करीब 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कराई गईं, लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त ने कथित तौर पर इन्हें सिरे से खारिज कर दिया।

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस ने इसे ‘वोट चोरी’ और ‘संस्था की चोरी’ करार देते हुए इसे ‘देशद्रोह’ (Treason) तक कह डाला है। हालांकि, चुनाव आयोग ने इन आरोपों को निराधार बताते हुए कहा है कि सभी फैसले तीनों आयुक्तों की आपसी सहमति से लिए गए हैं।

विपक्ष की घेराबंदी और कानूनी चुनौतियां

विपक्ष अब इस मामले की स्वतंत्र जांच और ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे पर अड़ा है। टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने 24 सितंबर को दिल्ली के पार्लियामेंट स्ट्रीट थाने में उनके खिलाफ आपराधिक आचरण की शिकायत दर्ज कराते हुए एफआईआर की मांग की है। हालांकि, संवैधानिक नियमों के तहत सीईसी को कानूनी इम्युनिटी (छूट) प्राप्त है, जिससे उन पर सीधे मुकदमा चलाना मुश्किल है।

वहीं, कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने भी मैदान संभाल लिया है। पार्टी संस्थापक अभिजीत दीपके ने चेतावनी दी है कि यदि ज्ञानेश कुमार 26 सितंबर तक इस्तीफा नहीं देते, तो 2 अक्टूबर से मुंबई से देशव्यापी आंदोलन शुरू किया जाएगा।

क्या हटाया जा सकता है मुख्य चुनाव आयुक्त को?

मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाना किसी सामान्य प्रशासनिक अधिकारी के तबादले जैसा नहीं है। भारतीय संविधान ने इस पद को असाधारण सुरक्षा प्रदान की है।

  • अनुच्छेद 324(5): संविधान के मुताबिक, CEC को पद से हटाने की प्रक्रिया वही है जो सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने की होती है। यानी इसके लिए संसद में स्पष्ट आरोपों के साथ प्रस्ताव लाना पड़ता है और उसे विशेष बहुमत से पारित करना होता है।

सत्ता का गणित: क्या महाभियोग सफल होगा?

विपक्ष संसद के दोनों सदनों में प्रस्ताव लाने की रणनीति बना रहा है, लेकिन राह में आंकड़ों की बड़ी दीवार खड़ी है। प्रस्ताव को पास कराने के लिए दोनों सदनों में अलग-अलग भारी बहुमत की जरूरत होती है।

  • लोकसभा की स्थिति: 543 सदस्यों वाली लोकसभा में एनडीए के पास 318 सांसद हैं, जबकि इंडिया गठबंधन के पास मात्र 184 सीटें हैं।
  • राज्यसभा की स्थिति: 242 सदस्यों वाली राज्यसभा में एनडीए 152 सदस्यों के साथ मजबूत स्थिति में है, जबकि विपक्ष के पास केवल 63 सदस्य हैं। अन्य क्षेत्रीय दलों (डीएमके, बीजेडी, वाईएसआरसीपी, बीआरएस) के 22 सदस्य भी निर्णायक भूमिका में होंगे।

वर्तमान संख्या बल को देखते हुए ज्ञानेश कुमार को पद से हटा पाना विपक्ष के लिए लगभग असंभव नजर आता है।

इतिहास के पन्नों में क्या?

भारत के इतिहास में अब तक किसी भी मुख्य चुनाव आयुक्त को महाभियोग या इस प्रक्रिया के जरिए नहीं हटाया गया है। संविधान में यह कड़े नियम इसलिए बनाए गए ताकि कोई भी सरकार राजनीतिक द्वेष के चलते चुनाव आयोग के प्रमुख पर दबाव न बना सके।

दिलचस्प बात यह है कि मार्च 2026 में भी विपक्षी सांसदों ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रस्ताव पेश किए थे, लेकिन लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा सभापति ने उन प्रस्तावों को स्वीकार नहीं किया था। ऐसे में देखना होगा कि विपक्ष की नई घेराबंदी क्या रंग लाती है।

ये भी पढ़ें: Explained: ज्ञानेश कुमार को हटाने की तैयारी में कांग्रेस! कैसे होती है CEC की नियुक्ति और हटाने का क्या है नियम?


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