शांतिदूत या हमलावर? अमेरिका-ईरान के बीच मध्यस्थ बना पाकिस्तान, पर अफगानिस्तान से छिड़ी है ‘खुली जंग’
पाकिस्तान अचानक गहराते अमेरिका-ईरान संघर्ष के बीच अपने कूटनीतिक संबंधों का इस्तेमाल कर एक ‘मध्यस्थ’ (मीडिएटर) के रूप में उभरा है। हालांकि, विडंबना यह है कि अफगानिस्तान के साथ उसका अपना सीमा विवाद और युद्ध, कई क्षेत्रीय देशों की कोशिशों के बाद भी अब तक अनसुलझा है।
ताजा रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध की आशंका को टालने के लिए अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत की राह आसान करने में जुटा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान, तुर्किए और मिस्र के जरिए हुई ‘सकारात्मक’ अप्रत्यक्ष कूटनीति का हवाला देते हुए ईरान के ऊर्जा ढांचे पर हमलों में पांच दिनों की सीमित रोक लगाने का ऐलान किया है। इस कूटनीतिक मोड़ का फायदा उठाते हुए इस्लामाबाद खुद को एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में पेश कर रहा है और दोनों देशों के शीर्ष अधिकारियों के बीच सीधी बातचीत की मेजबानी करने का प्रस्ताव दे रहा है।
पाकिस्तान के आर्मी चीफ जनरल असीम मुनीर ने व्हाइट हाउस के साथ बेहतर होते रिश्तों और सऊदी अरब, यूएई व तुर्किए जैसी क्षेत्रीय शक्तियों के साथ पुराने संबंधों का लाभ उठाकर इस पहल को आगे बढ़ाया है। इस्लामाबाद की इस सक्रियता के पीछे अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी अहमियत दोबारा साबित करने की छटपटाहट और मध्य-पूर्व की अस्थिरता के बीच आर्थिक लाभ बटोरने की मंशा छिपी है।
अफगानिस्तान के साथ जारी तनाव के बावजूद, अमेरिका-ईरान विवाद में कूदने की पाकिस्तान की यह इच्छा उसकी रणनीतिक और आर्थिक जरूरतों का परिणाम है। इस कदम के जरिए इस्लामाबाद घरेलू और क्षेत्रीय संकटों के साये में खुद को एक ‘जिम्मेदार वैश्विक खिलाड़ी’ के तौर पर स्थापित करना चाहता है। जनरल मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने पाकिस्तान को एक तटस्थ मंच के रूप में पेश किया है, जिसे राष्ट्रपति ट्रंप की भी सहमति मिली है। यह भारत, ईरान और अफगानिस्तान के साथ बढ़े तनाव के बाद अपनी साख बचाने की एक कोशिश मानी जा रही है।
पाकिस्तान अब खुद को वैश्विक कूटनीति के लिए ‘अनिवार्य’ साबित करने की कोशिश कर रहा है, भले ही अमेरिका और ईरान के बीच अब तक सीधे संपर्क की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
लेकिन इस कूटनीतिक सक्रियता के बीच एक काला पक्ष भी है। पाकिस्तान ने काबुल के खिलाफ ‘खुली जंग’ का ऐलान कर रखा है, जिसके तहत कई अफगान शहरों पर भीषण एयरस्ट्राइक की गई हैं। हाल ही में काबुल के एक ड्रग रिहैबिलिटेशन सेंटर पर हुए बम धमाके में 400 से अधिक लोगों की जान चली गई। यह खूनी संघर्ष 2,600 किलोमीटर लंबी विवादित डूरंड लाइन से जुड़ा है, जिसे अफगानिस्तान आज भी पश्तून भूमि का औपनिवेशिक बंटवारा मानकर स्वीकार नहीं करता।
पाकिस्तान का आरोप है कि तालिबान 2021 के दोहा समझौते को निभाने में विफल रहा है और अपनी जमीन का इस्तेमाल आतंकी गुटों को करने दे रहा है। इसी का तर्क देकर पाकिस्तान उग्रवादी ठिकानों पर हवाई हमलों जैसी जवाबी कार्रवाई कर रहा है। अक्टूबर में कतर और तुर्किए की मध्यस्थता से हुए सीजफायर से पहले 2025 की शुरुआत में हुई एक छोटी झड़प में 17 नागरिक मारे गए थे, लेकिन शांति अधिक समय तक टिक नहीं सकी और लड़ाई दोबारा शुरू हो गई।
अफगानिस्तान और पाकिस्तान के रिश्तों में अविश्वास की खाई इतनी गहरी है कि हफ्तों तक चले संघर्ष में अब तक सैकड़ों लोग मारे जा चुके हैं। ऐसे में ईरान युद्ध को रोकने की पाकिस्तान की कोशिशें, अपनी क्षेत्रीय विफलताओं के बीच ‘हताशा भरी कूटनीति’ को दर्शाती हैं।
रक्षा मामलों के विशेषज्ञ और लेखक ब्रह्मा चेलानी ने सोशल मीडिया पर तंज कसते हुए लिखा, “असीम मुनीर, जिन्हें राष्ट्रपति ट्रंप ने अपना ‘पसंदीदा फील्ड मार्शल’ कहा था, उन्होंने कुछ दिन पहले ही अफगानिस्तान के सबसे बड़े ड्रग रिहैबिलिटेशन अस्पताल पर बमबारी कर सैकड़ों मासूमों को मार डाला।”
काबुल अस्पताल की घटना ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस्लामाबाद की छवि को काफी नुकसान पहुंचाया है। यही वजह है कि पाकिस्तान अब अपनी छवि सुधारने और खुद को प्रासंगिक बनाए रखने के लिए अमेरिका-ईरान के बीच हाई-लेवल मध्यस्थता के जरिए संतुलन साधने की कोशिश कर रहा है। चेलानी ने यह भी याद दिलाया कि मुनीर के सैन्य नेतृत्व में ही पाकिस्तान ने जनवरी 2024 में ईरान के भीतर भी एयर स्ट्राइक की थी।
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